आज अग्नि सरिता में भिंगोए पांव लिए चलते हैं,
हम अपने संग क्रांति का सौभाग्य लिए चलते हैं।
पद ये पड़ेंगे जिस भी डगर पर, ज्योतित पथ को करेंगे,
बाद हमारे जग को ये एक अजर इतिहास कहेंगे।
आज हमारा, औरों का कल होगा स्वर्णिम वह सपना,
जिस पर अब तक सर्वस्व लुटाया है हम सबने अपना।
और दीप्त हो रहा है नभ देखो तन की ज्वाला से,
छलक रहा है अमृत जैसे इंकलाब हाला से।
चमक रहीं श्यामल ललाट पर श्रमवारि की बूंदें,
कैसे इस दुर्लभ मुख पर कोई रह सकता आंखें मूंदे?
फूट पड़ी हैं दिव्य शिराएं रक्तधार कंपन से,
ठंडक देती है ज्वाला जैसे शीतल चंदन से।
करुण विभाएं आज तरुण इस देह को सहलाती हैं,
पुण्य समीरा हल्के हल्के कानों में कहती जाती है-
"ओ कुमार, ये ही है आरम्भ तेरी अनंत कीर्ति का...
तुझको ही हरना है अब सारा विषाद धरती का।"
पुण्य दिवाकर जैसे अब हमको तो नित जलना है,
या कि हिमकर के समान रजनी को अमर करना है।
कौन कह रहा कर्ता कोई जग का शेष नहीं है,
यह आरोहण है जग का, कोई ध्वंस अवशेष नहीं है।- ©रजत द्विवेदी
10 AUG 2019 AT 12:35