Raj Bairwa   (© मुसाफ़िर)
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Joined 30 January 2017


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YESTERDAY AT 13:40

" इश्क़ का नाम बहोत था.... "

उनके शहर में इश्क़ का नाम बहोत था,
मेरे शहर में इश्क़ का काम बहोत था,

उनकी आदतों से थी यारी मेरी,
मेरी आदतों से उन्हें आराम बहोत था....

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22 OCT AT 22:37

" हासिल....... "
बेवकूफ़ियों की मिसाल हाज़िर है जनाब,
चंद लफ़्ज़ों की बदौलत सब नाराज़गी है जनाब,
अस्बाब-ए-परस्तिश है इश्क़ की खूबसूरती,
इश्क़ की मौत, गोर-ए-ग़म हासिल है जनाब....!!

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21 OCT AT 22:18

" तमाशबीन...... "

होता है रश्क़ मुझें भी ज़माने की फ़ितरत देखकर,
रंगों की तरह ये भी तेज़ धूप में बदल जाते है,
नही आता इन्हें सच बोलना शायद,
इसीलिए झूठ की नाव पर चढ़ आगें निकल जाते है...!!

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20 OCT AT 12:36

" हिज़्र की रात....... "

हिज़्र की रात का पहरा हुआ,
स्याह दर्द मिरा और गहरा हुआ,
कुरेदने लगा वक़्त,
ज़िन्दगी की हथेलियों पर नाम वो,
जिस ख़्वाब में रहा सुकून-ए-रूह ठहरा हुआ,

चंद लम्हों में जीने लगा दिल वहीं ख़्वाब,
हसरतों का रंग मानो जैसे सुनहरा हुआ,
सवालों के जवाब देने लगी तन्हाई मिरी,
उजालों की खुशबू से लिपटा मिरा अँधेरा हुआ,

हिज़्र की रात का पहरा हुआ,
स्याह दर्द मिरा और गहरा हुआ.....!!

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17 OCT AT 22:00

" बातिल ..... "
दर-ए-क़फ़स पर लौट आयेंगे,
वो मुजरिम-ए-इश्क़ आख़िर कहाँ जायेंगे,
सय्याद समझ बैठा है ज़माना उन्हें मगर,
हक़ीक़त-ए-बातिल वो क़ातिल सब से छुपा जायेंगे..!!

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14 OCT AT 22:16

" मसला -ए-इश्क़...... "

मसला-ए-इश्क़ में ख़ामोशी से क्या होगा,
हमसफ़र यूँही तो कोई नही रहा होगा,

लफ्ज़ मिटा देते है कभी दूरियां दिलों की भी,
मगर इश्क़ को लफ़्ज़ों से ही क्या सिलना होगा,

गुरुर तो ज़माने में बचा नही किसी का,
इश्क़ है गर सच्चा तिरा भी मुसाफ़िर,
तो यक़ीनन गुरुर से तो पक्का होगा,

मसला-ए-इश्क़ में ख़ामोशी से क्या होगा,
हमसफ़र यूँही तो कोई नही रहा होगा.....!!

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13 OCT AT 22:00

" तारों के शहर..... "

तारों के शहर का पता बतायें,
सूरज रात में मद्धम गति से ढलता जाए,

आँख का पानी प्यासा फिर भी,
नींद की बेल पर नए ख़्वाब लगायें,

दूर कहीं से कोई आवाज़ है आयें,
अंधेरों के जुगनू मंज़िल तक ले जायें,

किसे चाहिए, मामूली किस्से सादे से,
कौन यहाँ पर एक दूजे को सुनने आयें,

क़ाबा काशी तो सब सबकों प्यारे,
पाठ का असली मतलब कौन बतायें,

बीच चौराहे खड़ा मुसाफ़िर सोचें यहीं,
तारों के शहर से कहीं दूर चला जायें.....!!

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8 OCT AT 18:52

" तासीर..... "
हमें ताउम्र तासीर से गुरेज़ रहा दवा से नही,
ज़ख़्म भर तो गए बस दर्द कभी ठहरा नही,
बड़े क़रीने से सिला गया था ज़ख़्म को शायद,
खून बहा तो यक़ीनन बस किसी को दिखा नही...!!

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3 OCT AT 22:29

" आख़िरी अलविदा.... "

हम बदल ही कहाँ पाते है,
वक़्त से साथ हम भी गुज़र जाते है,
उम्र की दहलीज़ से पार चले जाना,
कोई रिहाई नहीं शायद,
क्योंकि यादों में तो हमेशा,
के लिए ही बस जाते है,
सुकून से कट जाता होगा,
सफ़र वो भी मगर अपने तो,
हर रोज़ दर्द में कहराते है...!!

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30 SEP AT 19:51

" दिल-ए-जानां ...... "

दिल-ए-जानां तिरे नूर से रोशन है मिरी ज़ीस्त,
स्याह रात का ये चाँद मिरे काम का नही अब,
चूम रही हो नज़रों से मुझें, तुम जिस तरह,
लबों की नमी की कोई जरूरत नही अब.....!!

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