Raj Bairwa   (© मुसाफ़िर)
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Joined 30 January 2017


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13 HOURS AGO

" एक नाम...... "

वो गुमसुम से बैठें थे, हाथों में एक नाम लिए,
बज़्म सजने लगी थी नए रिश्तों का पैग़ाम लिए,
दरवाज़े पर दस्तक हुई फिर एक बुलावा आया,
हमें छोड़ वो आगें बढ़ गए उनका नाम लिए.....!!

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11 MAY AT 22:10

" मेरा प्यारा चमकझंडुश..... "

नंगी हो चुकी है सीरत तुम्हारी,
ये लिबास तमीज़दारी का उतार फेंको,

दिल की नफ़रत में कितना जलोगें,
छोड़ो इस आग को निकाल फेंको,

चमकझंडुश से घूमते रहते हो बेवज़ह हर जगह,
कभी ठहरो और अपनी साख तो देखों.....!!

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10 MAY AT 21:50

" इश्क़ की महक..... "
लबों से गुलाबों की महक आने दो,
इन आहिस्ता बहते लफ़्ज़ों को ठहर जाने दो,

भर लो जिस्म को मेरे अपनी नर्म बाहों में,
साँसों को एक दूजे से गुज़र जाने दो,

टपक कर आने लगा यूँ पसीना माथे से,
अपनी सुराही नुमा गर्दन से ये मोती फिसल जाने दो,

एक दिलकश तस्वीर उकेर देगी अंगुलियां तुम्हारी,
बस इन्हें बेझिझक मेरे सीने पर बिख़र जाने दो,

धड़कने किसी राग की आवाज़ में गाएगी,
तुम इश्क़ को रूह तक पहुँच जाने दो,

पाक सफ़ेद हो जायेगा इश्क़ हमारा,
बस सारे रंगों को घुलकर एक हो जाने दो,

सलवटें बयां करेगी सिर्फ़ हाल-ए-जिस्म मुसाफ़िर,
इश्क़ को रूह में गहराई तक उतर जाने दो,

लबों से गुलाबों की महक आने दो,
इन आहिस्ता बहते लफ़्ज़ों को ठहर जाने दो....!!

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10 MAY AT 13:49

" कहाँ तक....... "

बेताब रूह और अनकहे जज़्बात दबायें कहाँ तक जा पाओगें,
ज़मीन कम पड़ जायेगी और टूटे बिखरे ख़ुद को नज़र आओगें......!!

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9 MAY AT 20:45

" सतही संवेदनाएं........ "

सतही संवेदनाओं का ये दौर,
गहन संबंधों की रोशनी को धूमिल करता है,
केवल शब्दों की चाशनी में डुबोते हुए,
हर प्रसंग में नकलीपन और नीरसता भरता है,
हाँ, हर विचार की अपनी स्वतंत्र दिशा है,
और अपनी एक निश्चित दूरी है,
परंतु दिन बीत जाने के बाद का प्रेम,
जाने क्यों कहीं ग़ुम दिखता है,
मानो जैसे तेज़ आंच पर पकाया हुआ भोजन,
जिसमे मसाले तो होते है,
मगर ज़ायका कुछ कम लगता है,
सतही रूप से भावनाओं को व्यक्त करना,
बहोत आसान तरीका है,
जिसे अपनाने में हृदय कम,और दिमाग़ ज्यादा लगता है,
फिर व्यक्ति अपने विचारों को,औरों की कसौटियों पर तोलता है,
प्रेम तो केवल प्रेम हो सकता है,
दिन,महीने,साल से क्या बदल सकता है,
पर हाँ अगर कुछ बदल जाए,
तो ये आडंबर सिर्फ व्यर्थ लगता है,
सतही संवेदनाओं का ये दौर,
गहन संबंधों की रोशनी को धूमिल करता है....!!

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7 MAY AT 22:17

" जरूरी जानकारी....... "

नमक का फर्ज़ अता करेंगें,
कुछ लोग अब मुझसे दग़ा करेंगें,

मेरे ज़ुबाँ में नरमी क्या आई,
जो ये चूज़े मुझसे अकड़ा करेंगें,

हमनें निकाला ही कहाँ है,
गुस्सा अपना इन दोगलों पर,

जो बिगड़ गए हम,
तो गली मोहल्लों में सब तौबा करेंगें,

नमक का फर्ज़ अता करेंगें,
कुछ लोग अब मुझसे दग़ा करेंगें....!!

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6 MAY AT 20:51

" क़सीदे दिल के..... "

क़सीदे दिल के हमनें कभी छुपाए नही है,
रोये तो हैं बहोत मगर,
ऐसा नही के मुस्कुरायें नही है,

वाकिफ़ हम भी है हर तरह के ग़म से,
वो अलग बात है कि किसी को बतायें नही है,

एक हँसी ही तो चाहिए इन लबों पर,
वो पल हमनें किसी की तिज़ोरियों से चुरायें नही है,

जो मिल सका उसी की इज़्ज़त कर ली,
ग़ुरूर की धूप में हमनें जिस्म सूखाएं नही है,

नींद को आसमान की छत पसंद है,
सितारें तो हमनें उनसे कहकर बिछाएं नही है,

ख़्वाबों की दुनिया जी ले एक मर्तबा मुसाफ़िर,
हक़ीक़त से तो हम कभी घबरायें नही है....!!

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5 MAY AT 22:26

" हमदम...... "
कितने सुकून से तुझें इस तरह लिखा होगा,
यक़ीक़न कोई तो जादू उन हाथों में रहा होगा,
धड़कने ठहर सी जाती है ज़ानिब तुम्हारे हमदम, खूबसूरती को नाम शायद,
तुम्हीं से जहां को मिला होगा...!!

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3 MAY AT 20:56

" निगाहें...... "

है निगाहों में जुगनू तुम्हारे,
अंधेरों को काट सकती हो,
जहां को जरूरत है ख़ुशियों की बहोत,
मुस्कुराहट से तुम वो यक़ीनन बाँट सकती हो....!!

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2 MAY AT 21:58

" डेमोक्रेसी...... "
ज़िन्दगी मौत की ज़द में तिलमिलाती रही
वो मुस्कुरा कर उनकी बाहों में इतराती रही,
कहीं जश्न मना जीत का कहीं हार की गूँज उठी,
और हर तरफ़ लाशों के ढेर देखकर वो राजनीति मुस्कुराती रही.....!!

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