Raj Bairwa   (© मुसाफ़िर)
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Joined 30 January 2017


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27 FEB AT 22:36

" जवाब देंगें...."
नज़रों की शिकायत का लफ़्ज़ों से जवाब देंगें,
तोहमतों से भरी क़िताब के सारे कर्ज़ उतार देंगें,
बड़ा ग़ुरूर है जिन्हें अपनी हक़ीक़त का,
उन्हें उनके झूठ के समंदर में डूबा देंगें...!!

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26 FEB AT 22:10

" जागों मोहन प्यारे..... "
तक़दीर को ताक़त समझकर बहक जाने वाले,
अक़्सर वक़्त के तमाचे से रूह तक काँप उठते है....!!

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25 FEB AT 22:57

" द्वंद..... "
मन की बातों का निकल जाना,
किसी उबाल सा फिर बिख़र जाना,
क्या सिर्फ़ द्वेष पैदा करता है,
उन सूक्ष्म मनमुटाव के अतिरिक्त,
लोभ लालच के भाव से विकसित,
क्यों सिर्फ़ क्लेश संबंधों में भरता है,
व्यक्ति विशेष की पहचान से उत्पन्न,
भाषा और सामाजिक ज्ञान के अलग,
हर घटना को क्यों एक सा देखता है,
प्रेम, ईर्ष्या और स्नेह की भांति,
शत्रु, मित्र और ये रिश्तेदारी,
क्या एक तराज़ू में तोला करता है,
भीतरी द्वंद के धूप छाँव में,
समय, परिवेश की सारी कलाओं में,
मनुष्य क्यों फिर सत्य से डरता है,
स्वयं की संभावनाओं को छोड़कर,
दूजे की शंकाओं पर ध्यान देना,
यही जीवन को कठिन और व्यर्थ करता है,
मन की बातों का निकल जाना,
किसी उबाल सा फिर बिख़र जाना,
क्या सिर्फ़ द्वेष पैदा करता है.....!!

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24 FEB AT 21:19

" मलाल..... "

ज़िन्दगी तेरी मिसालें भी क़माल है,
जवाबों से बेशक़ीमती तेरा हर एक सवाल है,
सच बताने मचलकर आये थे कल जो लोग,
आज झूठ से अलहदा कुछ बोले जाए,
कहाँ मज़ाल है,
आगें बोलकर कहीं लफ्ज़ मेरे बदनाम ना हो जाए,
बाकी तो दुनियां है दुनियादारी है,
इसी बात का बस हमकों गहरा मलाल है...!!

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23 FEB AT 20:55

" नक़ली चेहरे..... "
उजालों में तो सिर्फ़ चेहरे नज़र आते है,
मगर ख़ुद पर आए तो ग़लत सही मे बदल जाते है,
तमाशों में चीख़ने चिल्लाने वाले अक़्सर यहाँ पर,
मतलब की गलियों में बिन बतायें ठहर जाते है...!!

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22 FEB AT 21:55

" दौड़.... "
क्या दौड़ सी ज़िन्दगी है,
या ज़िन्दगी की दौड़ है,
मैं सही तुम ग़लत,
बस इस बात की होड़ है,
है नई राहें कई,
हर राह पर एक मोड़ है,
मंजिल का ना कोई पता,
पर हमसफ़र बेजोड़ है,
रात दिन यहाँ वो कहानी,
जहाँ किस्सों पर ज़ोर है,
सुकून से क्या लेना देना,
पैसा तो ताबड़तोड़ है,
क्या दौड़ सी ज़िन्दगी है,
या ज़िन्दगी की दौड़ है....!!

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19 FEB AT 21:43

" अरसा हो गया.... "
उनसे गले मिले एक अरसा हो गया,
इस तरह हुआ हूँ तन्हा की सफ़र घर सा हो गया....!!

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14 FEB AT 19:51

" ग़ुलाब...... "

थे मोहब्बतों के दिन, और मोहब्बतों में शाम की,
गर हो सिर्फ़ जरूरत तो मोहब्बत किस काम की,
फूल ग़ुलाब के हो या रहे खुशबू गुलदान की,
दिल जिसे अपना माने, दौलत वही है जां की....!!

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13 FEB AT 21:55

" गुज़ारा...... "

बड़ी मामूली सी बात का,
इरादा था मेरा,

तमाम तक़लीफ़ों का,
यही सहारा था मेरा,
दो बात किसी ने सुन ली,
अपना वक़्त दे कर,
ख़ामोशी से बेहतर ,
यहीं सफ़र अब गुज़ारा मेरा,

बड़ी मामूली सी बात का,
इरादा था मेरा....!!

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11 FEB AT 0:15

" तज़ुर्बे ..... "

ख़्वाब ठहर जाते है,
नींद नहीं रुकती है,
घाव तो भर जाते है,
टीस बार बार उठती है,
उम्र को महज़ गिननकर बताने वालों,
ज़िन्दगी की तो तज़ुर्बे ही पक्की मिट्टी है....!!

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