Rahul Barthwal   (राहुल बड़थ्वाल)
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Joined 11 April 2017


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Rahul Barthwal 11 APR AT 9:06


दरिया वाले तो सागर के पानी से मर जाते हैं!

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Rahul Barthwal 10 APR AT 16:17

हर तरफ़ बिखरी हुई है ख़ामुशी,
रूह तक लिपटी हुई है ख़ामुशी!

रातभर पी है उदासी की शराब,
ज़िस्म में उतरी हुई है ख़ामुशी!

गोलियाँ भी नींद दे पाती नहीं,
इस कदर रूठी हुई है ख़ामुशी!

मुझको तन्हाई के संग ब्याहा गया,
मेरे घर बेटी हुई है ख़ामुशी!

ज़िन्दगी ने शोर को तोला मगर,
मौत ने तोली हुई है ख़ामुशी!

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Rahul Barthwal 2 APR AT 9:12

साहिलों पर रेत का इक घर बनाना इश्क़ है,
प्यास से मरते परिंदों का ठिकाना इश्क़ है!

रातभर नोंचे है मेरे ज़िस्म की रानाइयाँ,
ये उदासी ही मेरा सबसे पुराना इश्क़ है!

अश्क़ टपके रूह तक उस शख्स को छूते हुए,
रूह का भीतर तलक यूँ भीग जाना इश्क़ है!

क्यों उसे रोता रहा हूँ, रातभर मैं बारहा,
रूह की चीखें बनाती है बहाना, इश्क़ है!

हम नदी के लोग सागर में कहाँ टिक पाएंगे,
कह रहा सारा जहाँ हमको दिवाना, इश्क़ है!

इक शज़र बूढ़ा हुआ तो गिर पड़ा, मिट्टी बना,
अब उसी की कब्र पर फूलों का आना इश्क़ है!

अब मुझे बीमार रहने दो मेरे चारागरों,
जब मरज़ कोई भी पूछे ये बताना, इश्क़ है!

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Rahul Barthwal 29 MAR AT 11:44

रातभर नोंचे है मेरे ज़िस्म की रानाइयाँ,
ये उदासी ही मेरा सबसे पुराना इश्क़ है!

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Rahul Barthwal 27 MAR AT 15:05

जिनको अपना कहके कभी पुकारे थे,
वो पंछी तो अज़ब प्यास के मारे थे!

इक किस्सा सुनकर ये आँखें रोई थी,
वो किस्सा जिसके किरदार हमारे थे!

इक तस्वीर बनाई उसकी आँखों की,
फिर तस्वीर पे सारी रात गुज़ारे थे!

एक परिंदा मेरी ज़ात का नबी हुआ,
जिसकी बस्ती के हम सब बंजारे थे!

हिज़्र में ख़ुद से बातें करता रहता था,
वहशत के ये कैसे अज़ब नज़ारे थे!

वो क्या जाने इस जुगनू पर क्या बीती,
शबभर जिसके पास हज़ारों तारे थे!

हमको चाक पे रखकर उसने ढाला था,
हम कूज़ागर पर ही सब कुछ हारे थे!

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Rahul Barthwal 22 MAR AT 13:37

वो क्या जानेंगें जुगनू की बेचैनी,
शबभर जिनके पास हज़ारों तारें थे!

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Rahul Barthwal 21 MAR AT 19:45

मर जाते है तुझको गाते गाते हम,
मर जाते है यूँ आवाज़ लगाते हम!

क्या तुझ तक मेरी आवाज़ नहीं जाती,
मर जाते है चिल्लाते चिल्लाते हम!

सुनकर शहरों की तन्हाई के किस्से,
मर जाते है तेरे गांव से जाते हम!

रूह में तेरी इतनी हिस्सेदारी है,
मर जाते है तेरा अक्स मिटाते हम!

तूने बस इस ज़िस्म का टुकड़ा चाहा है,
मर जाते है तेरी प्यास बुझाते हम!

पर्दे पीछे नयी कहानी चलती है,
मर जाते है ख़ुद को ये समझाते हम,

उसके हिज़्र के किस्से मत छेड़ो यारों,
मर जाते है किस्सा तुम्हें सुनाते हम!

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Rahul Barthwal 21 MAR AT 10:54

उस माँ के आंचल में भी खुशियों के रंग तू भर आना,
जिस माँ का प्रह्लाद नहीं आया है घर में होली पर!

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Rahul Barthwal 19 MAR AT 9:50

संबंधों की गठरी हल्की, आज व्यथा से मन भारी है,
साँसों में इक द्वन्द छिड़ा है, चलो कूच की तैयारी है!

चिर परिचित सारे मधुमासी, पर पतझड़ का आना तय था,
अंधकार बढ़ता जाता था, दिनकर का ढल जाना तय था,
हमने बासंती कलियों से, जीने को कुछ पल मांगे थे,
कहाँ पता था पल भर में ही, उपवन का मुरझाना तय था!

उपवन-उपवन यह वनवासी,उन फूलों की चाह में भटका,
पर उसको ही फूल मिले हैं, जो काँटों का व्यापारी है!

(अनुशीर्षक में क्रमशः...)

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Rahul Barthwal 16 MAR AT 14:04

तुममें उतरकर भी प्यासे रहे हैं,
क्यों न तुम्हें हम समंदर पुकारें!

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