Rahul Barthwal   (राहुल बड़थ्वाल)
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Joined 11 April 2017


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Joined 11 April 2017
Rahul Barthwal 10 AUG AT 22:13

एक शायर इस जहाँ की बेहतरी करते हुए,
थक गया है आदमी को आदमी करते हुए!

वो कि जिसकी खुशबुओं से था चमन रौशन कभी,
रो पड़ी आँखें उसे ही अजनबी करते हुए!

काश अब वापस चलें और तितलियों को रंग दें,
थक चुके हैं नौ से छः की नौकरी करते हुए!

सब परिंदों की रिहा तारीख़ पीछे टल गई,
कोर्ट तक भी रो रहा था मुल्तवी करते हुए!

'शम्स' कैसा शख्स है काफ़िर हुआ जाता है तू,
ज़िन्दगी भर बस ख़ुदा की बंदगी करते हुए!

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Rahul Barthwal 20 JUL AT 12:15

शबभर तक दिल को बहलाकर क्या होगा
झूठे वादों को दुहराकर क्या होगा

हमको प्यासा रहना बेहतर लगता है
उस दरिया से प्यास बुझाकर क्या होगा

टइटेनिक भी डूब गए जब आँखों में
कागज़ की पतवार बनाकर क्या होगा

उसके ज़िस्म की परतें शीशे जैसी हैं
सोचो उसको हाथ लगाकर क्या होगा

उसको चूमने तो ख़ुद धूप उतरती है
मेरा ऐसे ख़्वाब सजाकर क्या होगा

पत्थर ज़ात है वो हमको मालूम पड़ा
उसको अपना दर्द सुनाकर क्या होगा

जब वो तअल्लुक़ तोड़ने पर आमादा है
फिर उसको कुछ भी समझाकर क्या होगा

छोड़ो यारों ज़ेहन में फिर भी होगा वो
हिज़्र का झूठा जश्न मनाकर क्या होगा

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Rahul Barthwal 25 JUN AT 18:08

हर जगहा तू है तेरी ख़ुश्बू है,
मेरी आँखों में तेरे आँसू है!

तेरी गलियों में अब है घर मेरा,
मेरी साँसों में तू ही हरसू है!

तूने पत्थर के दिल को मोम किया,
तेरे कुन में ये कैसा जादू है?

तुझे छूते हुए मेरे हाथ जले,
तुझे पाते हुए मेरे आँसू है!

मैंने वहशत को संभाले रक्खा,
ये मेरा खुदपे कैसा काबू है?

तूने मेरे दिल में रौशनी भर दी,
जानाँ तू कितना प्यारा जुगनू है!

जब भी झाँका हूँ मैं खुद के भीतर,
मैंने पाया है मुझमें बस तू है!

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Rahul Barthwal 15 JUN AT 6:58

ये ग़ज़ल तो और कुछ है तर्जुमानी और कुछ,
दर्द मेरा और कुछ है पर कहानी और कुछ!

दो सिरों में ढ़ल रही है ज़िन्दगी की ये ग़ज़ल,
मेरा ऊला और कुछ है मेरा सानी और कुछ!

रेगज़ारों में बहस है किस नदी की सिम्त हो,
इसका पानी और कुछ है उसका पानी और कुछ!

जावेदां कुछ भी नहीं है ये सदाक़त जान लो,
जावेदानी और कुछ है ज़िन्दगानी और कुछ!

मत कहो तुम छिप चुकी है रूह की दुश्वारियां,
मुँह छिपाना और कुछ है बे-दहानी और कुछ!

क्या करम उसका हुआ हम और प्यासे हो गए,
प्यास मेरी और कुछ है कुन-फ़कानी और कुछ!

कह रहे तुम जानते हो मेरा दीवान-ए-कलाम,
लफ्ज़ मेरे और कुछ है पर म'आनी और कुछ!

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Rahul Barthwal 9 JUN AT 9:27

कितने ज़ख्म सहेगी दुनिया, कितनी लाशें ढोयेंगे हम?
कितने पंख कुतरकर ऐसे, आँख मूंदकर सोएंगे हम!

हम अपराधी से क्या कम है, जो सच सुनकर मौन रहे है,
मानवता के सारे मसले हम सबके हित गौण रहे है!
अब लाशों को ढोते कंधों पर अपनी बंदूकें रखकर,
चार दिनों तक झूठे आंसू, किन आँखों से रोयेंगे हम?

कितने ज़ख्म सहेगी दुनिया, कितनी लाशें ढोयेंगे हम?

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Rahul Barthwal 9 MAY AT 14:08

हर नफ़स और हर घड़ी ये सोचता रहता हूँ मैं,
"उसका माथा चूमने के बाद क्या रहता हूँ मैं"?

क्यों वो चेहरा बारहा आँखों से मिट पाता नहीं,
क्यों उसी की याद में दिनभर घिरा रहता हूँ मैं?

आखिरी सफ़ से गुज़र उसमें बदल जाऊँगा मैं,
जानता हूँ ये मगर, प्यादा बना रहता हूँ मैं!

छू लिया होंठों से उसने इन नमाज़ी हाथ को,
देर तक सज़दे में जिनको देखता रहता हूँ मैं!

चाहता हूँ वो शजर तो बस मुझे ही छांव दें,
सो नई शाखों को बरबस काटता रहता हूँ मैं!

ठीक ही है वो मुझे जोकर बुलाता हो मगर,
दुख ये है, जाना नहीं के क्यों बना रहता हूँ मैं!

आजकल पहलेपहल वो छू रहा है ज़िस्म को,
रूह प्यासी है मेरी पर टालता रहता हूँ मैं!

बन चुके है उन परिंदों के नये सौ घोंसले,
लम्स के एहसास से फिर भी हरा रहता हूँ मैं!

वो बना देता है आँखें ज़िस्म चेहरा चाक पर,
राख ठंडी है मगर सो अधपका रहता हूँ मैं!

दोस्त सारे पूछते जब, "कौन है भीतर तेरे",
एक साया ज़ोर से चिल्ला उठा, रहता हूँ मैं!

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Rahul Barthwal 1 MAY AT 15:28

जिन हाथों में होने थे गुब्बारे और कलम साहिब,
उन हाथों को मज़बूरी के छाले ढ़ोने पड़ते हैं!

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Rahul Barthwal 11 APR AT 9:06


दरिया वाले तो सागर के पानी से मर जाते हैं!

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Rahul Barthwal 10 APR AT 16:17

हर तरफ़ बिखरी हुई है ख़ामुशी,
रूह तक लिपटी हुई है ख़ामुशी!

रातभर पी है उदासी की शराब,
ज़िस्म में उतरी हुई है ख़ामुशी!

गोलियाँ भी नींद दे पाती नहीं,
इस कदर रूठी हुई है ख़ामुशी!

मुझको तन्हाई के संग ब्याहा गया,
मेरे घर बेटी हुई है ख़ामुशी!

ज़िन्दगी ने शोर को तोला मगर,
मौत ने तोली हुई है ख़ामुशी!

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Rahul Barthwal 2 APR AT 9:12

साहिलों पर रेत का इक घर बनाना इश्क़ है,
प्यास से मरते परिंदों का ठिकाना इश्क़ है!

रातभर नोंचे है मेरे ज़िस्म की रानाइयाँ,
ये उदासी ही मेरा सबसे पुराना इश्क़ है!

अश्क़ टपके रूह तक उस शख्स को छूते हुए,
रूह का भीतर तलक यूँ भीग जाना इश्क़ है!

क्यों उसे रोता रहा हूँ, रातभर मैं बारहा,
रूह की चीखें बनाती है बहाना, इश्क़ है!

हम नदी के लोग सागर में कहाँ टिक पाएंगे,
कह रहा सारा जहाँ हमको दिवाना, इश्क़ है!

इक शज़र बूढ़ा हुआ तो गिर पड़ा, मिट्टी बना,
अब उसी की कब्र पर फूलों का आना इश्क़ है!

अब मुझे बीमार रहने दो मेरे चारागरों,
जब मरज़ कोई भी पूछे ये बताना, इश्क़ है!

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