Rahul Barthwal   (राहुल बड़थ्वाल)
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Joined 11 April 2017


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Joined 11 April 2017
Rahul Barthwal 8 APR AT 17:16

तू क़रीब आ मिरे हमसफ़र तेरी जुस्तजू का ख़ुमार है,
तू वो शख्स है जिसे छू लिया तो मिरे सुख़न में बहार है!

तू फ़ज़ा का पहला फितूर था, तू नदी का पहला पड़ाव था,
तू ही आग था तिरी रौशनी तो नज़र नज़र में शुमार है!

मिरे ज़ख्म की कइ क्यारियों को तेरी छुअन की तलाश है,
मिरे पास आ इन्हें छू ज़रा मिरा ज़ख्म ज़ख्म फ़िगार है!

न कहा कभी तूने हाल-ए-दिल, न सुनी कभी वो खमोशियाँ,
ये हमारे किस्से के दरमयां ऐ सुकूत! कैसी दिवार है?

तू मिला मुझे उसी मोड़ पर जहाँ रास्ते थे बदल रहे,
तूने फिर भी मुझको सुना नहीं ये तू किस अना का शिकार है?

न शिकायतें, न रियायतें, न ही गढ़ सकेंगे कहानियाँ,
ऐ अली! हमारे भी दरमयां बड़ा आशिकाना क़रार है!

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Rahul Barthwal 7 MAR AT 11:09

ज़रा सोचो कि क्या मजबूरियां होंगी उस आदम की,
जिसे ग़ज़लें भी कहनी हो जिसे ऑफिस भी जाना हो!

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Rahul Barthwal 15 FEB AT 13:00

ज़िस्म की ये पतली चादर इक परदा है,
भीतर खालीपन बाहर इक परदा है!

कोई खुश दिखता हो ज़्यादा बात करे,
समझो चेहरे के ऊपर इक परदा है!

परदों से रिश्तों में दूरी बढ़ती नइँ,
इन दीवारों से बेहतर इक परदा है!.

सारे दुःख तकलीफों को ढक लेता है,
अपना असली चारागर इक परदा है!

तुम सब क्या समझोगे दीवानेपन को,
दो ही आँखें हैं जिन पर इक परदा है!

वो पागल तो 'शम्स' के अंदर रहता है,
ये काबा, मक्का, मंदर इक परदा है!

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Rahul Barthwal 2 JAN AT 20:53

मुझे तो उससे बड़ी अजब सी शिकायतें हैं,
क़रीब है वो ए यार तब भी शिकायतें हैं!

वो चूमती है बस एक माथा और एक धड़कन,
कई दिनों से ये मेरे लब की शिकायतें हैं!

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Rahul Barthwal 27 DEC 2019 AT 16:16

एक नज़्म "खरपतवार" अनुशीर्षक में

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Rahul Barthwal 3 DEC 2019 AT 5:33

छू गया इक अजनबी धड़कन हमारे ज़िस्म की
इस तरह पैदा हुई सिहरन हमारे ज़िस्म की!

उंगलियाँ उसकी हमारी उँगलियों में कैद थी,
रूह ख़ुद बनने लगी चिलमन हमारे ज़िस्म की!

उंगलियों के लम्स का इतना हुआ हम पर असर,
खुल गयी सब खिड़कियां रौज़न हमारे ज़िस्म की!

और फिर उसके लबों ने काम कुछ ऐसा किया,
बढ़ गयी थी हर तरफ़ फिसलन हमारे ज़िस्म की!

बिस्तरों पर कह गया वो वस्ल की ग़ज़लें नई,
और सिलवट बन गयी उतरन हमारे ज़िस्म की!

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Rahul Barthwal 4 OCT 2019 AT 16:14

एक उफ़क पर बादल धरती दोनों मिलते है कुछ यूँ,
जैसे बिछड़े यार मिले हो फिरसे चाय की टपरी पर!

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Rahul Barthwal 22 AUG 2019 AT 20:43

मुझको तेरी क़ुर्बतों ने मार डाला,
अनकही सी ख्वाहिशों ने मार डाला!

तू मेरा है और बस मेरा रहेगा,
मुझको इन खुशफहमियों ने मार डाला!

कौन मुझको याद करके रो रहा है,
ये मुझे किन हिचकियों ने मार डाला!

दिल मेरा कहता रहा,'तुम रोक लो ना'
बस तेरी खामोशियों ने मार डाला!

फोन भर का फासला था दरमियाँ पर,
इस अना के सिलसिलों ने मार डाला!

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Rahul Barthwal 10 AUG 2019 AT 22:13

एक शायर इस जहाँ की बेहतरी करते हुए,
थक गया है आदमी को आदमी करते हुए!

वो कि जिसकी खुशबुओं से था चमन रौशन कभी,
रो पड़ी आँखें उसे ही अजनबी करते हुए!

काश अब वापस चलें और तितलियों को रंग दें,
थक चुके हैं नौ से छः की नौकरी करते हुए!

सब परिंदों की रिहा तारीख़ पीछे टल गई,
कोर्ट तक भी रो रहा था मुल्तवी करते हुए!

'शम्स' कैसा शख्स है काफ़िर हुआ जाता है तू,
ज़िन्दगी भर बस ख़ुदा की बंदगी करते हुए!

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Rahul Barthwal 20 JUL 2019 AT 12:15

शबभर तक दिल को बहलाकर क्या होगा
झूठे वादों को दुहराकर क्या होगा

हमको प्यासा रहना बेहतर लगता है
उस दरिया से प्यास बुझाकर क्या होगा

टइटेनिक भी डूब गए जब आँखों में
कागज़ की पतवार बनाकर क्या होगा

उसके ज़िस्म की परतें शीशे जैसी हैं
सोचो उसको हाथ लगाकर क्या होगा

उसको चूमने तो ख़ुद धूप उतरती है
मेरा ऐसे ख़्वाब सजाकर क्या होगा

पत्थर ज़ात है वो हमको मालूम पड़ा
उसको अपना दर्द सुनाकर क्या होगा

जब वो तअल्लुक़ तोड़ने पर आमादा है
फिर उसको कुछ भी समझाकर क्या होगा

छोड़ो यारों ज़ेहन में फिर भी होगा वो
हिज़्र का झूठा जश्न मनाकर क्या होगा

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