Ragini singh   (Ragini singh)
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1st post. 12.8.2018
Birthday 9th February
Joined 11 August 2018


1st post. 12.8.2018
Birthday 9th February
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15 AUG AT 0:03

कमबख्त दिल ऐसी बेवकूफीयां
अक्सर करता रहता हैं

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14 AUG AT 23:57

और गुलामी की इन जंजीरो को बनाने वाली भी
कोई ना कोई स्त्री ही हैं

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11 FEB AT 16:45

मेरी मोहब्बत को रुसवा करके
तुम सुकून कहां पाओगे
जिस गली से गुजरोगे
हमारे नाम से जाने जाओगे

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17 SEP 2022 AT 23:44

कुछ दर्द अश्क बनकर
आँखों में उतर जाते हैं
कुछ दर्द बनकर मुस्कुराहट
इन लबों को सजाते हैं
बस वक़्त वक़्त का फर्क हैं
कुछ दर्द लबों से बयां हो जाते हैं
तो कुछ बनकर नासूर हर लम्हा
दिल को जलाते हैं
दर्द के रंग भी
कुछ कम नहीं है रकीब
के हर कदम पर ये
एक नये रंग में सामने आते हैं

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24 AUG 2022 AT 19:15

अगर कोई ऐसा कैमरा भी होता
जिसमें दिल का दर्द अक्श बन कर उतर पता
तो यकीन करिए उस अक्श में भी
सिर्फ आपका चेहरा ही नजर आता

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20 JAN 2022 AT 13:35

मैं एक सायरा हूँ जनाब
लब्जों से खेलना फितरत हैं मेरी
ऐसे कैसे सीधे सीधे कह दूं
दिल का दर्द मैं
के नए नगमों के लिए मुझे
इन लम्हों की जरूरत हैं

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20 OCT 2018 AT 2:27

लेखक इक खयाल लिखता है
शायद अपनी रचना में वो छुपा सवाल लिखता है
जो शब्द वस्त्रों की खाने हो
तो वो रेशमी रुमाल लिखता है
शब्दो के मोती से वो अहसासों के जाल लिखता है
जो देख के भी अनदेखी हो
वो बवाल भी लिखता है
लेखक वो लौ है जो जलके
महफ़िल की चाल लिखता है

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17 JAN 2022 AT 0:29

देखा जो तुझको दिल में हलचल सी हुई ,
दिल के दरवाजे पे एक दस्तक सी हुई ,

देखा जो तुझे ,भुला खुद को मैं,
दिल है तो वही पर अब धड़कन लगे नई.....

चाहा जो तुझको मैंने ,मेरी खता नही
तेरी ये सादगी ही मुझको पागल कर गई

कहता ये दिल मेरा ,हर लम्हा हर घड़ी
तू ही हैं आशिकी ,है आशिकी तू मेरी..........

देखा जो तुझको दिल में हलचल सी हुई..........


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15 JAN 2022 AT 22:54

तुम्हे चाहना
जलती हुई सिगार का एक कस हैं जैसे
मजा भी हैं ,सज़ा भी हैं
ज़िन्दगी का सुकून भी हैं
और मौत की वजह भी हैं

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15 JAN 2022 AT 22:42

तुझे भी पता हैं और मुझे भी पता हैं
ये तेरे मेरे दरमियां एक अनकही सी दास्तां हैं
ये तेरा मेरा रिश्ता तो बस अब कागज़ों में बचा हैं
ये तेरी जफ़ा और मेरी वफ़ा का इक टुटा हुआ किला हैं
कैसे कहें किसीसे के इस दिल को क्या हुआ हैं
शायद दर्द से लड़ते लड़ते ये ऊब सा गया है
कसमों, नज़्मों, वादों और यकीं का
मज़ार भी अब ढह सा गया हैं
के इस मकबरे के मलबे में बस दर्द शेष बचा हैं
बेपनाह पाक मुहब्बत का यही सिला हैं
के दर्द का आँचल ही अब दिल का सुकून रह गया हैं

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