Punit Pandey   (पुनीत_पाण्डेय)
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Joined 20 June 2019


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13 SEP AT 18:55

कभी मेरे मन की गँगा में देखना अपनी छवि और हमारे प्यार की थाह लगाना,
कँही तुझे खुद की न नजर लग जाए इसलिए गोरे चेहरे पर एक टिका ज़रा स्याह लगाना!

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25 AUG AT 18:44

वो हया की चुनरी ओढ़े अपने छत पर,
उसके दीदार की चादर तले मैं अपने छत पर,
कि घण्टों हम यूँ ही खड़े के खड़े रह गए!

क्या ख़ाक कर लेता ज़माना हमारा,
हमने तो कर ली सारी बातें आँखों ही आँखों में,
और शब्द सारे बगल में धरे के धरे रह गए।

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13 AUG AT 14:37

एक रोज अपने छत पर लेटा मैं चाँद से बातें कर रहा था,
मैं अपनी सुनाए जा रहा लेकिन चाँद बस सुन रहा था...
अचानक चहेरे पे मेरी कुछ बूंदे गिरी,
शायद बारिश शुरू हो गई थी...
मैंने बात बीच में ही रोक झट से अपना बिस्तर उठाया
और छत से नीचे उतर आया...
कमरे में आ कर मैंने खिड़की से चाँद को देखा,
उसे देख यूँ लगा की ये तो बारिश नही बल्कि,
चाँद काले बादलों के पीछे छुप रो रहा था...
मैंने सोचा कि जा के आँसू उसके पोछ आऊँ क्या?
इस बीच अचानक फिर से कुछ बूंदे मेरे हाथों पे गिर पड़ी,
कमरे में बारिश की कोई गुंजाइश नही थी, फिर ये बूंदे कैसी?
तब सहसा ये अहसाह हुआ की ये बूंदे ना बारिश है और न ही चाँद के अश्क़..
ये तो मेरी ही आँखे भर आईं थी अपनी व्यथा सुनाते-सुनाते..
भरी आँखों ने चाँद को भी रोता देख लिया था,
क्योंकि चाँद भी तो अकेला है इतनी रातों से,
वो अपनी व्यथा किसे सुनाए?
ऐसे ही अक्सर मेरी चाँद से बातें हो जाती है,
कभी मैं रो देता हूँ और कभी बारिश हो जाती है....

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6 AUG AT 18:44

तुम एक बार अपने पैरों की पायल छनकाओ तो सही,
कलकलाते झरने भी अदब से शांत ना हो जाएं तो कहना!

तुम एक बार अपने माथे पे बिंदियाँ लगाओ तो सही,
चमकता चाँद भी शरमा के ढल न जाए तो कहना!

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31 JUL AT 14:48

शहर में यूँ तो उनदिनों रास्ते तमाम हुआ करते थे!
लेकिन....

हम सब छोड़ उसकी ही गली से गुजरें,
ये सिलसिले भी आम हुआ करते थे!

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17 JUL AT 19:55

अजी, मेरी नीदें चुरा ली गई हैं!

मैंने तुम्हारे ही इश्क़ की अदालत में तुम पर मुकदमा किया है,
और ज़ुल्म तुम्हारे खुले गीली जुल्फ़ों को दिया है!

तुमने इस दिल को कर दिया बेचैन बड़ा है,
और मैंने धड़कनें बढ़ाने का एक अदना इल्जाम तुम्हारी खनकती चूड़ियों पे मढ़ा है!

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4 JUL AT 16:26

तेरा मिलना अब हम समझाएँ किस तरह,
शायद, बारिशों में चाय की तरह!

इस कदर जुड़ा हूँ तुझसे कि हम बताएँ किस तरह,
शायद, आगोश में तेरे साए की तरह!

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29 JUN AT 13:07

काश जिंदगी भी माँ जैसी होती..

मैं थक-हार के घर वापस आता,
वो गोद में मुझे लिटा लेती,
मैं पूरे दिन का हाल सुनाता,
वो थपकी दे मुझे सुला देती..

मैं परीक्षा के दिन सुबह जब जल्दी उठता, वो झट से चाय बना लाती,
मैं उसके पैर में अपना सिर रख आशीर्वाद माँगता, वो खुद भगवान स्वरूप दही-शक़्कर मुझे खिला देती..

कभी लगती जो ठोकर मुझे, आँख नम होने से पहले सीने से वो मुझे लगा लेती,
मैं झूठ ही कहता की ठीक हूँ माँ, लेकिन वो दर्द मेरा समझ मरहम मुझे लगा देती..

काश जिंदगी भी माँ जैसी होती..

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25 JUN AT 15:29

वैसे तो मुझे समझने का दावा करते हैं बहुत लोग,
और आलम यूँ कि मुझे अपनी कवितायेँ भी समझानी पड़ती हैं उन्हें!

वो तो तू है जो बिन बोले समझ जाती है हाल-ए-दिल,
बाकी जिंदा हूँ बताने के लिए धड़कती धड़कनें सुनानी पड़ती हैं उन्हें!

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20 JUN AT 20:18

मैंने अपनी साँसों को उनके नब्जों में गिरवी रखा,
और,
अपना ठिकाना बनाने उनसे दिल उनका उधार लिया!


उस दिल की हर ख्वाहिश पूरी करने का जिम्मा उठाया,
और,
बदले में उनके प्यार का ही पगार लिया!


प्रेम-बंधन के धागे में धड़कनों को यूँ पिरोया,
कि,
वो दिल भी हमारा हुआ और ता-उम्र वंही गुजार दिया!

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