प्रज्ञा मिश्र   (Pragya Mishra 'पद्मजा')
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Joined 20 September 2018


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उमड़ते घुमड़ते मुझमें ही उलझता मेरा व्यक्तित्त्व
एक कल्पना से सौ सत्य बुनता मेरा मस्तिष्क,
कोई देख नहीं पाता मैं नकार नहीं पाती ,
उन आकृतियों पर मेरा वश नहीं है
वे स्वप्न तो कभी खुली आँखों में उभरती हैं
डराती हैं, पकड़ती हैं पर मिलती कभी नहीं!
कोई स्वीकार नहीं पाता, मैं त्याग नहीं पाती ,
ये लोग कौन हैं जो मेरे भीतर हैं
मुझे खदेड़ते हैं, पर पकड़ते कभी नहीं?

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to an unknown myself.

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जो व्यक्ति के हृदय को प्रेम से
और अधरों को स्मित से भर दे
अपने कलाकार को
अहंकार से दूर कर दे

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सुनने हैं दुनिया के सवाल अभी देने हैं जवाब
अपनी ही ज़िन्दगीं में जैसे एक मेहमान हूँ
यहाँ अपनो के लिए अपने इरादों का देते हैं हिसाब
दूसरों की शर्त पर चलने की गुनहगार हूँ



ज़िन्दगीं इतनी आसान भी नहीं
कि लगे बस मजबूर कर के छोड़ देती है
आदमी को जब ये माँ-बाप बनाती है
सुना है इम्तिहान और कड़े कर देती है

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अजीब है ये इंतज़ार भी
आता है न आने के लिए

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यादें हैं
कभी भी आ जाती हैं

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abandoning childhood

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जो प्यार की शक्ल में गिर पड़ती है
हमारी ही रूह पर
छोड़ लर आधा अधूरा
लहू लुहान मन

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जो अहंकार के तमस को दूर कर
ज्ञान की ज्योति जगा दे
विद्या का मर्म
सरल जीवन के कर्म बता दे
किसी के प्रभाव में नहीं
किसी भी अभाव में नहीं
बस अपने स्वभाव में रहना सिखा दे।

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और फ़िर करते वही हैं
जिसपर आश्रित है
महीने का पे चेक

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