प्रज्ञा मिश्र   (Pragya Mishra 'पद्मजा')
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Content Creator, Podcaster , Blogger at Shatdalradio, Radio Playback India and Mentza
Joined 20 September 2018


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घर खर्च जैसे धीरे धीरे
घर की चिंता में घुली
अपनी देह सहित
खर्च हो जाती हैं स्त्रियां
कितनी अजीब होती हैं स्त्रियां

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बदन पर ये कपड़ों का लबादा
ऑफिस की दीवारों में चुने
एयर कंडीशन की ठंडी घटा
दर्द ए कमर आराम कुर्सी जानलेवा है
ज़्यादा खुश नसीब है
खुली पार्किंग में दूधो नहाई मेरी गाड़ी
दुनिया में आए आदमी के लिये
सूरज से इतनी दूरी जानलेवा है

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Life these days feels like
standing on the stack of
large empty boxes
standing tall without content,
smiling, waving, seemingly cheerful
yet drowing in tsunami of anxiousness
is it vitamin d, b12 or just need to
get rid of thoughts where I dwell

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स्त्रियों को हमेशा
दस तरह की परेशानियां
लगी रहती हैं
कभी महीना लगा रहता है
कभी महीना निकालने की
हड़बड़ी लगी रहती है
और जब सब कुछ
चल रहा हो ठीक
सब ठीक कैसे है
ऐसी शंकाएं मची रहती है
अजीब होती हैं स्त्रियां
चिंतामणि का वृक्ष बनी रहती हैं

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मन नहीं कर रहा
साकारात्मकता की
घुट्टी पीने का,
तय किया है
छद्म दवा की शीशी
नाली में बहा दूंगी

फिर सोचती हूं
रुक जाऊं दो दिन,
क्या पता
कल मन बदल जाए
और फिर पछताने लगूंगी

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अपने अपने दुखों के मध्य
नाखुश रहने के लिए
इतने मजबूर कि
दुश्मन के दरवाज़े पर
अपशब्द सुनने चले जाते हैं
एक खेप डायरी की
फिर भरने चले आते हैं
जैसे बइज़्जती नहीं
कंटेंट जुगाड़ने की
साप्ताहिक योजना हो

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अपनी पीड़ा को भगाती
हर कलम यही चाहती है
कि लिखते लिखते
या तो दुःख निकल जाएं
या दम निकल जाए
विडियो गेम सा जीवन
खेलते खेलते खेलने वाला
अकारथ ही थका हारा जाए

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दुःख जीवन की कथा नहीं है
पर बहुत तीव्र है जहां कहीं है
कुछ ही क्षणों का अतिथि था वो
लेकिन मन पर घाव वहीं हैं

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मैं खेत की रखवाली करती
एक बिजूका
आवश्यकता की सर्द रात में
धूं धूं कर जला दी गई
तड़के प्रतिस्थापित कर दी गई
खेत बचे रहें, बिजूका कोई रहे
बिजूकाएं निर्जीव हैं

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तुम्हारे मेरे बीच की दूरी
तय करता पुल
अपमान और अपशब्द
के गड्ढों पर बने
पैचवर्क से भर गया है
बार बार नए टेंडर
नए कंट्रेक्टर देख कर लगता है
दो लोगों के बीच
समस्या को बनाए रखने में
कई लोगों का घर चलता है

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