Priti Jaiswal   (Shivarga_PerplexingThoughts)
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Joined 30 November 2017


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Priti Jaiswal 20 JAN AT 23:31

गलतियों की,

माफी माँगी,
नहीं मिले;

सजा माँगी,
तो तुम मिले।

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Priti Jaiswal 20 JAN AT 23:24

सूरज की कुछ किरणों को
अवशोषित कर लेना चाहती है
देह मेरी,

ताकि बना सके इक सूरज,
जहाँ ताप नहीं।

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Priti Jaiswal 19 JAN AT 14:51

तुम दृश्यानुवाद हो
उन सभी गीतों का
जो कभी गाये गये

सरसों के खेतों में

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Priti Jaiswal 17 JAN AT 2:17

The pain is calm, be alright.

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Priti Jaiswal 15 JAN AT 8:51

मेरा प्रेम
तुम्हें वैसे घेरेगा

जैसे किसी वयस्क वृक्ष को
घेरे रहते हैं खरपतवार

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Priti Jaiswal 13 JAN AT 9:45

तुम्हारा रुखा रवैया
इस हिमपात की तरह है
जिसमें
कुम्हला जाती है
मेरी प्रेम रुपी तुलसी।

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Priti Jaiswal 13 JAN AT 9:07

बहुत आसान है
बिना छंद की कविताएँ लिखना

बहुत कठिन है
मन की बात व्यक्त करना

और कहीं
इन दोनों के बीच ही है
ये समझना कि

दोनों एक हैं।

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Priti Jaiswal 12 JAN AT 20:57


प्रेम
वाणिज्य नहीं।

इसलिए
प्रेम
लेन-देन नहीं समझता।

इसलिए
प्रेम,
इकतरफा भी होता है।

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Priti Jaiswal 12 JAN AT 20:54


प्रेम
कला नहीं।

इसलिए
प्रेम
षडयंत्र नहीं रचता।

इसलिए
प्रेम
किया नहीं, हो जाता है।

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Priti Jaiswal 12 JAN AT 20:49

प्रेम,
विज्ञान नहीं।

इसलिए
प्रेम,
ऊर्जा द्रव्य समीकरण नहीं समझता।

इसीलिए
प्रेम
देह तक सीमित नहीं।

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