Prerna  
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Joined 9 October 2018


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Joined 9 October 2018
Prerna 11 HOURS AGO

ये जो मेरा मन
तेरे लिए हर
मर्यादा, हर
सीमा का
उल्लंघन
कर बैठता है,
कभी कभी
सोचती हूँ,
"तू भी कहीं
रावण तो
नहीं ?"

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Prerna YESTERDAY AT 22:12

जहाँ मैं एक पंक्ति में सिमट जाती हूँ,
वहाँ हमारा प्रेम मेरा सन्दर्भ और
तुम मेरा भावार्थ बन जाते हो !

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Prerna 17 JUN AT 21:10

हमारे हिन्दू धर्म में...
"कर्म" करने के पश्चात "फल" की इच्छा करना निषेध है,

इसीलिए हम "काण्ड" करते हैं...!

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Prerna 17 JUN AT 14:32

17वीं लोकसभा के प्रथम सत्र में
एक बिल यह भी प्रस्तुत किया जायेगा....

कि ब्रेकअप जैसी दिल दहलाने वाली
मानव जनित आपदा को अत्यधिक विनाशकारी
प्राक्रतिक आपदाओं की श्रेणी में रखा जाये!

इससे पीड़ित व्यक्तियों के लिए अतिरिक्त प्रेमी और प्रेमिका
की सुविधा मुहैया करायी जाये!

इसके लिये एक मंत्रालय की भी व्यवस्था कि जाये
और हैल्प लाइन नम्बर भी चलाया जाये!

इसकी तीव्रता को नापने की प्रणाली तैयार की जाये
और विभिन्न श्रेणियों में वितरित किया जाये!

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Prerna 14 JUN AT 21:27

मुद्दतों बाद आज आईना देखा,
तू जरा भी नहीं बदला मुझमें !

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Prerna 14 JUN AT 20:53

कहीं टूटी उम्मीदें, तो कहीं बिखरे सपने,
और हर दरार के पीछे सिर्फ मेरे अपने !

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Prerna 12 JUN AT 10:09

जरूरत और ज़िम्मेदारी इन्हें सख़्त बनाते हैं
ये लाचारी और गरीबी के घाव खाते हैं
वरना मासूम हाथों में पत्थर कहाँ सुहाते हैं,

खिलौने मिट्टी के बने हैं इनके या
मिट्टी ही खिलौना है उनके लिये
ये कह पाना जरा सा मुश्किल है हमारे लिए,

पढ़ा था एक दिन अखबार में
स्कूली बस्तों का अब वजन कम किया जायेगा,
मगर पढने को मिली नहीं खबर
कि सिर पर ज़िम्मेदारी ढोने वालो के लिए भी
एक आयोग बनाया जायेगा,

ना जाने कैसा भगवान रहता है इनमें
जो करता नहीं फिक्र अपनी ही पनाह की
जिन्हें मतलब ही नहीं पता जुर्म और पाप का
न जाने वो काटते हैं सज़ा किस गुनाह की!

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Prerna 11 JUN AT 18:18

लिखने को तो कुछ सूझता नहीं है आजकल
बस बार बार डायरी खोलकर देख लेते हैं,
कि तुझपर लिखे अल्फाज़ भी
तेरी तरह बदल तो नहीं गए!

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Prerna 8 JUN AT 8:18

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Prerna 7 JUN AT 10:03

सोचो कितना हसीन वो मंजर होगा
जब मेरी ही जान के हाथों में, मेरी मौत का खंजर होगा,

रह जायेगी ठहर कर ख़ामोशी लबों पर मेरे
और कोई तूफान उमड़ता अन्दर होगा
जख़्म भी होगा मेरे ही सीने में और
मेरी ही आँखों में ठहरा समन्दर होगा,
साजिश से बहारों की फिर चमन कोई बंजर होगा
जब मेरी ही जान के हाथों में, मेरी मौत का खंजर होगा,

लायेगा दिलबर ही ग़र तोहफ़ा मौत का
तो करना इन्कार जरा सा मुश्किल होगा
रोयेगा जो लिपट कर अपने ही क़ातिल से
कोई और नहीं वो जाहिल मेरा ही दिल होगा,
महल मेरी मुहब्बत का तबाह कोई खण्डहर होगा
जब मेरी ही जान के हाथों में, मेरी मौत का खंजर होगा,

फ़रिश्ता जन्नत का हमसे, आखिरी हसरत जो पूछेगा
सलामती उसकी मांगेंगे कुछ और हमें ना सूझेगा,
रो पड़ेगा खुदा भी देखकर वफा हमारी उस दिन
और सीना उस दिन इश्क़ का भी ज़र-ज़र होगा
जब मेरी ही जान के हाथों में, मेरी मौत का खंजर होगा,
सोचो कितना हसीन वो मंजर होगा, वो मंजर होगा!

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