Praveen Yadav   (बवाल (skattered_soul))
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Joined 6 September 2017


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Joined 6 September 2017
Praveen Yadav 1 DEC AT 13:30

शख़्सियते दोस्त जी
आसमान से गिरी पहली बर्फ़ सी
नाज़ुक और हल्की फुल्की

मनोभाव सरल एवं सादा
बोली में मिठास थोड़ा जियादा
अनुभव की हो दुकान लिए
सुकूँ भरा ज्यूँ मुक़ाम लिए

वो हैं मनोहर, सबकी प्रिये
कभी स्नेह अपार कभी शुभाशीष लिए
कभी कलम चलाये वो अंतरंगी
है दोस्त जी मिली ऐसी सतरंगी

हर दिन खुशियाँ मिले ज्यूँ हो त्यौहार
हो मुबारक ये दिन बार - बार

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Praveen Yadav 30 NOV AT 22:23

ये मेरे भीतर मेरी ही कमी क्यूँ है
ये लबों पर हँसती सी नमी क्यूँ है

क्यूँ हैं सूखे से ये आँखों के सागर
ये बदन पे भी हरारत जमी क्यूँ है

क्यूँ अलसाया है आलम ये हरसू
ये मेरी खुमारियाँ यूँ सहमी क्यूँ है

क्यूँ चाहत में है दो जाम छलके
ये बेकारियाँ मुझ पर थमी क्यूँ है

क्यूँ आरज़ूओं ने पहनी ख़ामोशी
ये तन्हाई भी इतनी ग़मी क्यूँ है

क्यूँ हर कोई पूछे है सवाल मुझसे
ये बवालगिरी मेरी यूँ वहमी क्यूँ है

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Praveen Yadav 23 NOV AT 20:38

रहा मुंतज़िर उस शख़्स की तलाश में
जो जीना सीखा कर मौत से मिला दे

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Praveen Yadav 23 NOV AT 20:00

चाँद की तलाश में छान डाला समंदर
कहो कैसे मिलता जो था मेरे अन्दर?

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#बवालगिरी _मेरी रग़बत 🖤
खरोंचों के .. समंदर तक 🖤

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Praveen Yadav 23 NOV AT 19:50

कसक पूरी हुई मेरी, कसक बनकर
जीना सीखा मैंने मौत वाले दिन ही!

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#बवालगिरी _मेरी रग़बत 🖤
मेरे मरने से मेरे जीने तक 🖤

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Praveen Yadav 19 NOV AT 23:20

चेहरे पर सिलवटें जितनी गहरी होगी
दुनिया तुम्हारे लिए उतनी ही बहरी होगी

गुमाँ नहीं करना कभी अपने नर होने पर
एक नारी ही बस तेरी सच्ची प्रहरी होगी

तू गाँव सा रहेगा सदा अपने ही घर में
आदतें चाहे कितनी भी तेरी शहरी होगी

तुझे होगा आभास, गुजरे हुए वक़्त का
जब भीतर तेरे भी कोई याद ठहरी होगी

मिला करेंगे ख़्वाहिशों के निशाँ ठूँठों से
ओ सपनों वाली रातें सबसे जहरी होगी

आईनों से पूछेगा अंततः कि कौन है तू?
तब देखना हर मर्द आह तेरी देहरी होगी

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Praveen Yadav 14 NOV AT 21:36

बचपन से पचपन तक इक दौर गुज़र जाता है
सब कुछ भूल जाते हैं सब कुछ याद आता है

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Praveen Yadav 14 NOV AT 6:26

प्रकृति का सर्वोत्कृष्ट क्षण है
अँधेरे का प्रकाश से मिलन
एक नयनाभिराम दृश्य
घंटों जिया जा सकता है ऐसे पलों को

इनमें सुकूँ का अतिशय भंडार है
इन्हीं क्षणों में सुनाई पड़ते है
नदियों का साज़ों सरगम
पक्षियों के मधुर कलरव
महसूस होती है एक अनंत शांति
और खुशबूएँ अनेक

यूँ ही नहीं है इनका होना
सभी का एक निश्चित उद्देश्य है यहाँ
इसी प्रकार ये संयोग भी
रोज़ होता है दो बार 'सुबह और शाम'
जो दिन भर और रात भर के थके
ज़िंदगी के पथिकों को
देता है सुकूँ और तैयार करता है
आगे के सफ़र के लिए!!!

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Praveen Yadav 13 NOV AT 22:34

बदन पे लगा दाग़ कभी गहरा नहीं होता
सितारों की रोशनी पर पहरा नहीं होता

आँसुओं से लिख तो दूँ, दास्तान दर्द की
मग़र! दरिया, समंदर से गहरा नहीं होता

हटा तो दूँ नक़ाब मौकापरस्तों का, मग़र
हर मुखौटे के पीछे यहाँ चेहरा नहीं होता

बरकत है खुदा की, ज़र्रे - ज़र्रे में जहां के
फ़िज़ूल यहाँ दश्त~ओ~सहरा नहीं होता

बवाल भी यही है कि हम राह भटक गए
मग़र वजह में कभी भी कोहरा नहीं होता

होता ग़र ज़वाब हर पूछे गए सवाल का!
दोस्त मैं यूँ सब जानकर बहरा नहीं होता

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Praveen Yadav 11 NOV AT 7:33

न तुम्हें पाने की ख़ुशी न ही खोने का ग़म
देखो जानां फ़िर भी कितने सुकूँ में हैं हम

निशां न मिला बीते वक्त का देखा चार-सू
ये कौनसी दुनिया में देखो आ गए हैं हम?

क्यूँ बह रहे हैं रेत से शब्द शब्द वादे इरादे
ये वक़्त की आँधी और बिखरे बिखरे हम

न आईना अब जानता, न मैं पूछता वजह
मेरे भीतर मैं हूँ नहीं तो क्यूँ हम का वहम

उम्मीद-ए-चराग़ बस ज़िंदगी है, बंदगी है
फ़िर क्यूँ बीते कल में ख़ुद खो रहे हैं हम?

पूछो हमसे ये कैसा बवाले सुकूँ में हैं हम
तुम्हें चाहा, तुम्हें चाहेंगे ओ जी रहे हैं हम

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