Praveen Yadav   (बवाल (skattered_soul))
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Joined 6 September 2017


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Joined 6 September 2017
Praveen Yadav 25 JUL AT 21:01

दिले बागबां के श्मशान होने तक
हमें जीना होगा सामान होने तक

आरजूएँ परस्तिश में मौत न माँगे
भूख सताती है बेईमान होने तक

क़ीमत बचपन की लगाने वालों
जीने दो उन्हें भी जवान होने तक

घरों के रोने के अब सबब न पूछो
वो भी जिए बस मकान होने तक

समंदर भी बस सुहाना लगता है
इन हवाओं के तूफ़ान होने तक

दूर वो शजर किसका उदास है?
दो उम्मीद पूरे अरमान होने तक

बाद तुम्हारे तुम्हें कोई न पूछेगा
राबता है सबका, शान होने तक

ये बवाल तुम्हें ज्यादा न उबाएंगे
झेल लो जिस्‍म में जान होने तक

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Praveen Yadav 24 JUL AT 0:30

ख़ुमारियाँ चेहरे पर बे-हिजाब रखती हैं
चाँद भी जले, यूँ नूर बे-हिसाब रखती हैं

ख़ाली होकर भी हैं सबसे ज्यादा व्यस्त
लबों को बंद नज़रों में आदाब रखती हैं

अदा बारिशें, अंदाज़ आज़ाद झरने जैसे
ज़िंदगी की ज्यूँ, खुली किताब रखती हैं

हैं जो बारीकियाँ ज़हीन सी ज़ेहन भर में
सब कहते हैं! बातों में शराब रखती हैं

कुछ ऐब पाल कर शख़्सियत में अपनी
जाने कितनों की आदत खराब रखती हैं

जड़ों से जुड़ी हैं, हैं ज़माने -सी तेज़ भी
घर -बाहर अपने सब शादाब रखती हैं

सबकी जुबां ले नाम 'किस्सों वाली बाई'
बवाल कलम बस यही ख़्वाब रखती है

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Praveen Yadav 18 JUL AT 17:00

ये इश्क़े सितम और तन्हाई
पूछो उनसे, क्यूँ ये रुसवाई

दोनों ओर दिल आधे आधे
मार डालेगी! अबके जुदाई

वो मुझसे क्या रूठी देखो?
है रूठी मुझसे मेरी परछाई

उलफ़त 'शिद्दत' चाहे क्यूँ?
जब आनी हिस्से हो दुहाई

मैं आवारा, मैं ही बंजारा?
यार मेरा, है सच्चा शैदाई

मैं तो बवाल यूँ ही करूँगा
कहो मुझको बस हरजाई

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Praveen Yadav 13 JUL AT 8:23

मैं आदतन अपनी आदतों का शिकार करता हूँ
हाँ! बस यही गुनाह है, जो मैं हर बार करता हूँ

मेरे हौंसलों में जाँ फूँके वो सुबह आती ही नहीं
अब रातों को, मैं अपने हिस्से हक़दार करता हूँ

ये शोख़ियाँ फ़ज़ाओं में दिखावटी रह गई सारी
मैं हिज्र का प्यासा सहराओं को बहार करता हूँ

मेरा यार क्यूँ? तकल्लूफ़ करे मुझ पर मरने की
इसलिये मैं भी सिर्फ़ इक तरफ़ा प्यार करता हूँ

ये लोग ज़माने में ज़माने से होने लगे हैं आख़िर
मजबूरन! मैं भी घर को अपने बाज़ार करता हूँ

ये बवाल मेरे मैंने पाला है इन्हें अपने बच्चों जैसे
कौन हो तुम? जो कहते हो मैं व्यापार करता हूँ

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Praveen Yadav 13 JUL AT 0:33

जिस ख़ामोशी को तूने मुझे जीना सिखाया
अब वही ख़ामोशी देख मुझे जीने नहीं देती

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Praveen Yadav 12 JUL AT 11:40

इश्क़ को कभी बारिश कभी बादल कहती है
तो हिज्र को कभी साँप कभी संदल कहती है

याद करती है वतन को हर साँस आते- जाते
परदेस को अपने, आँख का काजल कहती है

पिरोने लगी हैं बस रूहानी इश्क़ उसकी नज़्‍में
हाँ! आजकल वो ख़ुद को भी पागल कहती है

माँ को ढूँढ लेती है अब आईने के उस पार ही
अपने पल्लू को, वो भी अब आँचल कहती है

उसने सीखें हैं, कुछ इस कदर रिश्ते निभाने
अपना आए ज़िक्र तो दिल को कल कहती है

तड़प उठती हैं, जितनी हैं मुर्दा रूहें तक यहाँ
तल्ख़ियत उसकी जब - जब ग़ज़ल कहती है

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Praveen Yadav 11 JUL AT 3:32

तुम्हारी बातों में
जब मेरी बातें मिलती हैं
तो लगता है कि जी रहा हूँ मैं

तुम्हारे ठहाकों संग
जब मेरी हँसी घुलती है
तो लगता है कि जी रहा हूँ मैं

तुम्हारे आँसुओं संग
जब मैं बह लेता हूँ
तो लगता है कि जी रहा हूँ मैं
.
.
.
हाँ...
यूँ तो कहने को बड़ा दिल है मेरा
मग़र इस दिल की दुनिया में तुम्हें घर सा पाता हूँ
तो लगता है कि जी रहा हूँ मैं

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Praveen Yadav 8 JUL AT 9:56

मुझे रास आए, महफ़िल में वो बात नहीं है
ये ज़िंदगी ख़ाक सी जो तू मेरे साथ नहीं है

मैं दिल जला हूँ, अपनों के फ़रेब देख- देख
यूँ दिल छूने भर की गैरों में औक़ात नहीं है

ऊँच- नीच, जात- पात महामारियाँ है बुरी
साफ़ मन से बढ़के दूजी कोई जात नहीं है

रात ज़ालिम है ख़ामोश मेरा सब्र देख कर
वरना मुझे डराए अँधेरों में औक़ात नहीं है

यूँ तो रोज़ सफ़र तय करता हूँ ज़िंदगी का
मग़र कुछ हासिल करूँ वे जज़्बात नहीं है

एक बवाल है, जो सीने में पल रहा है मेरे
वरना थामे मुझे, काँधे पर वो हाथ नहीं है

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Praveen Yadav 7 JUL AT 22:25

उस रात के नज़ारे भी, क्या ख़ास होते होंगे
जिस सुबह को आपके एहसास मिलते होंगे

खिलती होगी कायनात ये गुलशन की तरह
आपके साथ में सपने ख़ुद साकार होते होंगे

तरुणाई की अरुणाई से जलता होगा सूरज
आपको देखने ही रोज़ ये तारे निकलते होंगे

जहां में है जितनी खुशियाँ सारी मिलती रहे
क़िस्मतों को रब से यही इशारे मिलते होंगे

ना आए ग़म आपके दर कभी ग़लती से भी
अपनों के आशीष यूँ हकीकत सिलते होंगे

मुबारक हो इस बवाले अंदाज़ में जन्मदिन
वरन् देने वाले तो, तोहफ़े भी ख़ूब देते होंगे

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Praveen Yadav 5 JUL AT 11:36

!/! बारिश !/!

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