Pragya Thakur   (प्रज्ञा ~ (Word_Slinger))
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Joined 2 September 2017


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Pragya Thakur 3 HOURS AGO

निशा के एक पहर में
तारिकाओं के साथ
जागते आसमान को निहारते है
कितने हीं तन्हा प्रेमी

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Pragya Thakur 3 HOURS AGO


तन्हा जी तो सकते होंगे ना लोग
फ़िर भी ना जाने क्यूँ जी नहीं पाते

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Pragya Thakur 30 MAR AT 17:58

सब छोड़ कर हीं तो पाया ये मैंने
की जो भी खोया वो मिरे लायक कहाँ था !

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Pragya Thakur 30 MAR AT 17:55

रास्तों पर हीं रहा किए ता उम्र जो मजदूर
उन्हें रास्ते भी नहीं मिले हाय क्या जुलम है!!

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Pragya Thakur 16 MAR AT 14:09

इतनी भी कमज़ोर नहीं कि हर बात पर रो दूँ
पर मजबूत दीखने को झूठा हंस नहीं सकती

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Pragya Thakur 16 MAR AT 14:05

गुलाब में काँटे उसकी हिफाज़त को होते गर
तो भला कोई हाथ उसे तोड़ते क्या ??

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Pragya Thakur 16 MAR AT 13:54

चलो अपने अरमानों का गला घोंटा जाएं
हर ख्वाहिशें पूरी हो ये भी तो जरूरी नहीं

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Pragya Thakur 16 MAR AT 1:04

उफ़ मार भी तो नहीं पाते उन ज़ज्बातों को
जो गलत हो भी तो पहचाने जाएं देरी से

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Pragya Thakur 16 MAR AT 0:59

जुगनुओं को बुझाने की साज़िश में
वो तमाम लोग थे जिन्हें उजाले से डर था।

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Pragya Thakur 4 MAR AT 18:09

दिन और रात के बीच का सबसे खूबसूरत पहर जो उमूमन मैंने अपने साथ हीं बिताया एकांत में,
उस पहर में आकर मेरी एकांकी ले लेने वाले ज़ुल्म व सितम हो तुम !

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