Pragya Thakur   (Pr@gya(Word Slinger))
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Joined 2 September 2017


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Pragya Thakur 19 JAN AT 11:20

तुम्हारी इक बात समझने में, मैंने सदियां लगा दी
तुम बात-बात पर कहते हो, मुझें समझ लिया तुमने?

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Pragya Thakur 14 JAN AT 21:45

टूट कर पत्ते जुड़ते नहीं शाख़ से
नया पत्ता अक्सर हीं नई जगह बनाता है

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Pragya Thakur 12 JAN AT 11:35

दिल को भी तमीज़ नहीं किस्से जा उलझना है
जिसे कद्र नहीं आती उसी के पास चला जाता है

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Pragya Thakur 12 JAN AT 11:32

मेरे लिए स्मृतियां किसी बच्चे की तरह है
जो कि बड़ा हो कर अपनी निजता बना लेता है
और मैं उनसे दूर होती जाती हूँ.

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Pragya Thakur 11 JAN AT 12:22

इत्तेफ़ाक़ से हीं उनका मिलना भी हो जाया करता है
मोहब्बत भी हैं और जताते भी नहीं कुछ ऐसे लोग.

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Pragya Thakur 11 JAN AT 11:06

डूब जाने दो उन कश्तियों को
जो किसी किनारे नहीं जाने वाली
समुन्दर के बीचों बीच फंसे रहने में क्या मज़ा है?

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Pragya Thakur 10 JAN AT 15:27

मैंने कितना लिखना चाहा कोलाहल करती अपनी वेदनाओं को
लिख कर के मिटाना भी चाहा
पर वो मेरे लिखने मिटाने की प्रक्रिया में
पुनः जीवित होती गयी
उसकी प्रकृति और प्रवृति दोनों
नहीं बदले
मैं अब समझी की इसे यूँ हीं साथ रहने दिया जाए
वैसे हीं जैसे मां का साथ होता है
पिता का साथ
साथ हो ना हो पर करीबी
और बाक़ी रिश्तें कितने अजीब
साथ हो कर दूर
दूर हो कर साथ
बस ऐसे हीं वेदना की ये लिखने मिटाने वाली
रिश्तेदारी खत्म की जाए

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Pragya Thakur 6 JAN AT 12:30

सारे कागज़ के शेर कागज़ पर हीं मर जाते है
या भूखे मार दिए जाते है.

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Pragya Thakur 6 JAN AT 12:28

मुझ जैसा हीं कोई प्रेम में, मुझकों मिलेगा
कितना कमाल होगा !!!

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Pragya Thakur 5 JAN AT 10:55

मैं चंद रोज़ में गुज़र जाऊँगी
वक़्त तो सालों साल यूँ हीं चलता चलेगा

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