Pragya Thakur   (Pr@gya(Word Slinger))
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Joined 2 September 2017


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Pragya Thakur 20 OCT AT 14:52

दफ़्न रहती है हर किसी के सीने में एक राज़ चुप्पी बन कर
किसी ने महबूब को तो किसी ने उसकी याद को दफनाया है

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Pragya Thakur 19 OCT AT 8:36

रात पे ग़ज़ल लिखती हूँ
तेरे सांस के आंच के चूल्हें में
मेरा दिल धुआँ धुआँ सा था
तेरे हाथ की नरमी तकिए सी
मेरे गर्दन को यूँ थामें थी
तू धीरे धीरे कानों में
कुछ ईश्क़ मुश्क सा कहता था
मैं हल्की हल्की सांसों से
कुछ आह वाह सी भरती थी
वो रात ग़ज़ल सी लगती है
वो बात गज़ब सी लगती है

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Pragya Thakur 19 OCT AT 8:21

वो ना अजीब हीं सख्श है उसको मोहब्बत तो है
पर ख़ुद को छुपाने की अदा भी कमाल है उसमें

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Pragya Thakur 19 OCT AT 8:16

अब तो उसकी मुझे ज़ुस्तज़ू भी नहीं
याद आती है क्यों जिसकी आरज़ू भी नहीं.

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Pragya Thakur 18 OCT AT 17:26

अकारण नहीं हुआ यूं हीं मेल अपना
पिछले कर्मों के धागे भी सुलझाने थे

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Pragya Thakur 18 OCT AT 17:23

तुम नर नारायण से जो कलयुग को बांटते
मैं सती शिव सी युगों युगों से उपस्तिथ हूं

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Pragya Thakur 12 OCT AT 22:41

हम उनकी शिकायत किससे करें
वो हैं कि शिकायत के भी काबिल नहीं

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Pragya Thakur 11 OCT AT 13:11

छूने से प्यार मैला हो गया अक्सर
लोगों ने समझा रिश्ते वक़्त से मलिन हुए

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Pragya Thakur 9 OCT AT 22:46

मैं बहुत दूर आ गई सफ़र में
अब घर लौटने में भी वक़्त लगेगा !

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Pragya Thakur 9 OCT AT 22:41

उसे कुछ रोज़ तो ठहरना होगा
मुसाफ़िर भी थक कर बैठता तो है हीं

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