28 JUN 2020 AT 23:30

एक पुराना यादों का कम्बल है
धागे भी बहुत है
उलझन भी ज्यादा है,
धागे थोड़े घिस गए है,
जिंदगी से काफी लड़े है।
ऐसे कम्बल ओढ़े नहीं जाते,
बक्से में सहेजें जाते है।
जो बुनना ही हो तो,
चलो रूई खरीद लाए,
गिलाफ चाहे इन्हीं धागों का रख लेंगे,
पर भीतर के एहसास खुद ही भर लेंगे।

- PanchTatwa Girl