आज ही हमने बदले हैं कपड़े
आज ही हम नहाए हुए हैं

बचपन में जब ये पंक्तियाँ सुनते थे तो बड़ी हँसी आती थी कि ये कैसा गाना है। फिर एक बार एक दोस्त के सामने ख़ुद के बारे में यही पंक्तियां कहीं तो उसने कहा - "ऐसे नहीं बोलते।" और फिर उसने जब अर्थ बतलाया तो मुँह खुला का खुला रह गया। देखा था, जानता था पर इन पंक्तियों को कभी उस अर्थ में सोचा नहीं था। मज़ाक उड़ाने में ही रह गए थे तब तक। एक लाश को दफ़नाने या जलाने से पहले नहलाते हैं और कपड़े बदलते हैं और मरने वाला कह रहा है-

ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे
दाग लगने न पाये क़फ़न को
आज ही हमने बदले हैं कपड़े
आज ही हम नहाये हुए हैं

कितना मार्मिक है ये।

- Piyush Mishra