पीयूष मिश्रा   (Piyush Mishra)
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यायावर The Wandering Poet
Joined 9 October 2016


यायावर The Wandering Poet
Joined 9 October 2016

बातों में अपनी तू बता बातें छुपा रहा है क्या
क्या है जो दिल के तेरे अंदर ही अंदर चल रहा
ये छुपाना मन पे तेरे बन के काजल जम रहा
सोच मत, ना ही डर
बात कर

देख ना बातों से तेरी खनखनाहट खो गई
है हँसी चेहरे पे पर वो खिलखिलाहट खो गई
क्या तेरे मन को अंधेरे की तरह है डस गया
सोच मत, ना ही डर
बात कर

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वोक सायर इन लाॅकडाउन
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ग़रीब, मजदूर, विद्यार्थी, कंपटीसन की तैयारी वाले सब भूखे हैं, सड़क पर हैं और आप... आप पकवानों की फोटो लगा रहे हैं? थू है मिडल क्लास पर...

अच्छा हाँ, आज शाम मैं 'मिर्जा चाचा के नाती' पेज से लाइव सायरी सुनाउंगा। जरूर सुनिएगा दोस्तों

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तीन साल की हो गई बिल्ली
बोली स्कूल में जाऊँ
बीच राह में मिल गया कुत्ता
बोला भाऊँ भाऊँ
स्कूल में सारे बोले "मे आई कम इन मैडम?"
बिल्ली दरवाज़े से बोली "मैडमजी मैं-आऊँ?"
"मैं-आऊँ?" "म्याऊं म्याऊं म्याऊं!"

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2 अक्टूबर और गांधीजी की प्रासंगिकता
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इस देश में गांधीजी को लेकर कई खेमे हैं।
एक खेमा वो है जो 2 अक्टूबर हो या 30 जनवरी, बात-बेबात बस एक ही बात कहता रहता है- "गांधीजी की हत्या आरएसएस ने की"

दूसरा खेमा उसी आरएसएस के प्रचारक रहे वर्तमान प्रधानमंत्री और उनके आस-पास के लोगों का है जो भाषण, टीवी, ट्विटर, फेसबुक पर एक ही बात कहीं भी घुसेड़ देता है- "गांधीजी ने कहा था।"

तीसरे खेमे में ऊपर वाले दोनों के समर्थक हैं जिनके लिए 2 अक्टूबर से अधिक महत्व 1 अक्टूबर का है जिस दिन वो व्हाट्सऐप, फेसबुक और ट्विटर पर गांधीजी की फोटो के साथ एक ही लाईन चिपकाते चलते हैं - "स्टॉक भर लो, कल ठेका बंद रहेगा"

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जाने कितनी ही इच्छाएँ
दफ़्न हो गयीं मन के अंदर
और उदासी की इक कोंपल
उग आयी है उसके ऊपर

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इंद्रधनुष के सारे रंग मिला कर उसने
मुझे दिखाया सादा दिल ऐसा होता है

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....

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पहले मुझको ख़ुदा किया
फिर बुत मुझको बना दिया

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सब रस्ते घर को जाते हैं
तो कैसे घर खो जाते हैं

दिन को चमकें सूरज से हम
शाम को दरिया हो जाते हैं

थक गए सपने पूरे करते
अब हम थोड़ा सो जाते हैं

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जागती आँखों से देखता हूँ सपने
ना जाने कब से मैं सोया नहीं हूँ

हँसता हूँ क्योंकि मैं सब सहता हूँ
अपनी बातें ख़ुद ही से कहता हूँ
उलझ कर मैं ख़ुद से ही रह गया हूँ
तड़पता हूँ कब से मैं सोया नहीं हूँ

राह नहीं है पर मैं चलता हूँ
बेमंज़िल ही रोज़ निकलता हूँ
कभी तो ख़त्म होगा सफ़र ये
भटका हूँ अक्सर मैं खोया नहीं हूँ

लम्बी है रात कि सूरज नहीं आता
ठहरा हूँ मैं कि ये पल ही नहीं जाता
जागती आँखों से देखता हूँ सपने
ना जाने कब से मैं सोया नहीं हूँ

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