देखो आसमां से आज फिर से
टूटा एक तारा है
जैसे कुदरत दे रही
दुआओं के मुकम्मल होने का इशारा है
ये ऐसा समर्पण है जो हर कोई कहां कर
पाता है
औरों की दुआं पूरी करने की खातिर
हर - बार
खुद टूट बिखर जाता है
बंद आंखों से कभी अब मै ख्वाब कोई देखती नही
जो ना हो पूरी कभी
मै वो दुआं ही मांगती नही
हाथों की लकीरों जो लिखा है
जिंदगी मे वही मिलता है
कैसे मानू सच है ये
पल पल जब लकीरों का लेखा
बदलता है
औरों से क्या जीते हम
खुद से ही हम हारे है
सच तो ये है हमे हमारी
सोच ही बांधे है

- Khawahishon ke "Pankh"