कागज की कस्ती संग घूमा करता था
सारी खुशियां तब मिलती थी नादानी में
दुनिया हमको क्या कहकर के छोड़ेगी
हम दुनिया को छोड़ आए बेध्यानी में
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(नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे!)
सुनो ठहर कर तुम मैं सालाना वाला बाढ़ हूं
युवाओं की मत पूछो मैं लाचार बेरोजगार हूं
थोड़ा श्रमिक पलायन की दयनीय मार हूं
सरकारी नौकरियों में गिनती का अंबार हूं
नौकरी सिवा कुछ ना करते मैं यहां कंगाल हूं
कल कारखानों में तो यूं सालों से कबाड़ हूं
खेल कूद , व्यापार में पिछरो का सरदार हूं
तकनीक की मत पूछो मैं लोगों का जुगार हूं
छोटे बच्चो की सांसों का मैं चमकी बुखार हूं
मैं वहीं सुशासन की भ्रम में कैद सा बिहार हूं-
तल्ख भाषा का खेला किसी शायर का जागीर नहीं है यहां
खेल बराबर का है,शब्दों से भी खेलेंगे कोई अपमान थोड़ी है
मुंह में गुठली लेकर बकते हो हर दिन, और तकलीफ में भी जी रहे यहां पर
एक सांस शरियत मे ले ही लो तुम , हम भारतीय बुरा मान जाएं ऐसा थोड़ी है-
हम दर दर पर कह देते है साथ है हम
त्योहार ही मिलाते दूजे से पास है हम
फिर त्योहार से ही क्यों बेचैन है आज
स्वीकार नहीं रीति दिखता झूठा त्याग
जमी के उपर पैर के नीचे खून है संग
नहीं देखा जाता मुबारक से मोह भंग
हाथ दोनों है एक सा बढ़ रहे आगे
एक में स्वाद दूजे मे स्नेह दिखाते
जिसको हम है रोटी खिलाते उसके साथ तुम रोटी खाते
दूरी तो है इसमें कोई गुंजाइश नहीं क्यों आडंबर सजाते-
इतना दूध बहाने से तुम्हे क्या ही मिलेगा बेहतर है ये दूध सभी मरीजों को दीजिए
बड़ी अच्छी दलील है तो अब पब पार्टी और नशा छोड़ वो पैसे गरीबों को दीजिए
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बिक जाती है सपने भी , आंगन तक भी तो बिक जाते
बस एक दिन की खुशियों में सारे आसमां भी दिख जाते
अरमान जरूर खुशियां में थी वो घर बार छोड़ के आई थी
दहेज की किश्त से ही मां बाप के शान भी तो बिक जाते-
हमारे समाज की बुराइयां क्या अपनी नहीं होती,
समस्या दूजे की हो तो क्या समझनी नहीं होती
अब शुरुआत खुद से ही हो तो हर्ज क्या इसमें
कुप्रथाओं को रोकना है उसे बढ़ानी नहीं होती-
देश में विज्ञान फैल रहा होनहार वैज्ञानिकों की कोशिश में
बड़े स्तर के अनुसंधान में खुद को ना चुनाने की खिश में
वो खुद परीक्षण करते है बना रखा है मदरसा प्रयोगशाला
पर गलती से कभी ब्लास्ट भी होता चीथरे चीथरे पीस मे-
कभी जात पर मेहरबान होता है
कोई मजहब का खेल सरेआम खेलता है
कभी धांधली इम्तेहान में कराए
कोई अंतिम सूची में नाम एकतरफा मेलता है
कोई समाजवाद बोलता है कोई सुशासन की बात करे
कोई मजहबी तुष्टिकरण में लिप्त कोई विषैली घात करे
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बिहार गरीब है पिछरा भी है हर पार्टी का रहा इस राज्य में सरकार है
फिर भी स्वाभिमान के लिए लड़ता युवा यहां तो आरक्षण का बुखार है
अफसर बिटिया जरूर बनाओ कोई गुरेज नहीं काबिलियत भरपूर उनमें
पर बिना स्वास्थ्य व शिक्षा सुधार के कुर्सी तक का राह बड़ा जोरदार है-