Mufeed Alam  
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Joined 21 January 2018


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Joined 21 January 2018
Mufeed Alam 19 HOURS AGO

मैंने कई बार दस्तक़ दी आपके दहलीज़ पे हवा बन के, हमनशीं!
वो आपकी ग़लती थी जो हमें महसूस करके नज़र अंदाज़ कर गये।

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Mufeed Alam 19 HOURS AGO

वो अकेले की गुफ़्तगू और भी संजीदा हो जाती है,
रूहें मुतमईन हो तो जिस्मों को भी मिला देती हैं।

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Mufeed Alam 19 HOURS AGO

अपने तरीक़े हैं लोगों के मुहब्बत करने के,
कुछ जिश्म वाले हैं और कुछ रूह वाले हैं।

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Mufeed Alam 19 HOURS AGO

तेरी यादों के कई ख़ज़ाने बना रखें हैं मैंने,
कुछ तुझे मालूम हो गये और कुछ नही भी।

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Mufeed Alam 20 HOURS AGO

ये जो अपने लबों को दबाके मुस्कुराते हो,
जिश्म की ये हरकतें रूह मुझे बता जाती है।

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Mufeed Alam 20 HOURS AGO

इंसानियत के नाते मैं भी तेरा निगेहबान हूँ बस,
तुझे परेशानी है तो, तू ख़ुद को मुझसे दूर करले।

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Mufeed Alam 20 HOURS AGO

किसने किसको छोड़ा क्या फ़र्क़ पड़ता है,
तन्हा मैं भी हूँ और तन्हा आप भी हो गये हैं।

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Mufeed Alam YESTERDAY AT 2:45

महफ़िल में तो औऱ भी दिखे थे उस शाम को,
तुझसा आज भी न दिखा उस शाम के बाद।

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Mufeed Alam YESTERDAY AT 23:08

मुहब्बत तो है आपसे इसमें कोई शक नहीं,
लेक़िन तुम्हें पाने की मुझे कोई चाहत नही।

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Mufeed Alam YESTERDAY AT 23:05

उसका बे वज़ह अकेले में मुस्कुराना,
उसे ख़ुद में ही पागल बना रहा है।

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