Mishty _Miss_tea   (Mishty's moment ©)
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Joined 30 September 2018


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22 MINUTES AGO

मोहब्बत में मोहब्बत के सिवा कुछ न कर पाए,
नज़रों से दूर हम फ़कत...बस तुम्हें सोच पाए,

इल्म नहीं था हांसिल वो दर्द_ए_मोहब्बत का,
हम शिफ़ा नहीं पाए फ़कत...ज़ख्म खुरेच पाए,

कभी नहीं ला पाए तोहफ़े में मोहब्बत का इक चाँद,
बस सितारे गिन पाए फ़कत... तकिए को नोंच पाए,

बुलाते तो आते तेरे दर, तेरे घर, तेरी गली, तेरे शहर,
पर जाने को हम फ़कत... तेरे सपनों तक पहुंच पाए,

मोहब्बत में मोहब्बत के सिवा कुछ न कर पाए,
नज़रों से दूर हम फ़कत...बस तुम्हें सोच पाए,

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7 HOURS AGO

बेबस है ये आँखें .....उनके दीदार के लिए,
चाय आधी छोड़ के बैठे है मेरे यार के लिए,

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16 HOURS AGO

अपने अपने विरह के दोषी हम ख़ुद होते है,
भीतर की कल्पनाओं से परे
हमें उतना ही प्रेम करने की आवश्यकता थी
जितना हमें मिल रहा था

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30 JUN AT 19:34

फिर वही लंबी... बोझिल शाम का वक्त
और फिर एकबार मैंने चाय बनाकर पी ली..
यहां शाम गुजरती नहीं और
कप में पड़ी चाय खाली होती जा रही है,

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30 JUN AT 17:19

गर मोहब्बत दे ख़ुदा... ज़ब्त की तहज़ीब ना दे किसी को,
उफ्फ.. ख़ाक का पुतला ये और चरागो से है रोशन लेकिन,

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30 JUN AT 11:44


सच है मेरी जाँ बिछड़ने ने के बाद कोई इख़्तियार नहीं रहता
तुमको भुल न पाऍंगे तो कैसे कह दे तुम्हारा इंतज़ार नहीं रहता,

हमको बसाया था रूह में, सजाया था अपनी दिल की दीवारों पर,
क्या ख़ाली करने पर मकाँ, तेरी रूह पर हमारा कोई अधिकार नहीं रहता,

यूं ही उदास दिल है बैचैन सी रातें और बोझिल सी लगती है तन्हाई,
सच कहो दौर_ए _तन्हाई तुम्हारा दिल भी मिलने को तलबगार नहीं रहता,

नज़रें मिला के कह दो क्या गिला करूं मैं, क्या मुझे भूल पाओगे तुम?
दिल टूटने पर, हाथ छूटने पर मेरी जाँ क्या यहां प्यार... प्यार नहीं रहता...

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30 JUN AT 10:40

तमन्नाओं के शहर में,कुछ यूं भटक गए हैं,
बड़ी देर से हम सटक गए हैं
बारिश बेहाल करती है,
यादें बवाल करती है,
आँखें है जो नम रहती है,
तुम्हारी कमी अब भी सनम रहती है,
बोझिल दिल का हाल है,
दर्द कम है पर कमाल है,
बाहर रेशम सी बरसात है,
अंदर तन्हाई की धूप है
इश्क़ की आग में धधक रहे हैं,
मोहब्बत के ज़ख्मों से चटक गए हैं
इश्क़ में चाय पी रहे हैं और अटक गए हैं

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30 JUN AT 9:13

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29 JUN AT 14:18

कुछ उनकी अदाएं कातिल थी,कुछ हमें भी मरने का शौक़ था,
जिस कदर जान से हाथ धो बैठे, लगता है हमें मोहब्बत का रोग था,

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29 JUN AT 10:43

ઝંખના... પાણી નો પરપોટો જેમ ફૂટી જાય છે
હસ્તરેખા માં નથી જે, હાથમાંથી છુટી જાય છે,

ઈચ્છા ની ગાગર છલકી ને જેમ રાખી હો માથે,
એક નદી આંખ માંથી વહી ને છલકી જાય છે,

મળ્યું એ ગમ્યું નહીં, ને ગમ્યું એ મળ્યું નહીં,
કાચી નીંદર ના સપનાં અધવચ્ચે થી તૂટી જાય છે,

રાજા ને રંક બનાવે ને રંક ને બનાવી રાજા
કોઈ પામે પારાવાર ને કોઈ જીંદગી લૂંટી જાય છે,

જાણે સાપસીડી ની જેમ આ હસ્તરેખા ની રમત,
ઝાંઝવા નાં જળ અહીં જમીન ને છેતરી જાય છે,

કોઈ માગ્યાં વગર પામે કોઈ ને માગ્યાં પછી પણ નહીં,
વ્યાખ્યા હસ્તરેખા ની સમજાવતાં કલમ બટકી જાય છે

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