Mishty _Miss_tea   (Mishty's moment ©)
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Joined 30 September 2018


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22 NOV AT 8:06

बस इसीलिए
वो मंदिर की चौखट
और छोड़ दिए
सारे धागे....
.
उसने कहा भी तो ये ....
.
ईश्वर के लिए
हमें बांधा मत करो...

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18 NOV AT 13:01

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18 NOV AT 7:59

म'आलूमात करनी हो किसी जगह
मोहब्बत की हवाओं को गर,
पुछ लेना... उस शहर की चाय कैसी है

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17 NOV AT 9:30

संभावनाओं के
विस्तृत आकाश से दूर,
किसी किताब के
श्वेत पन्नों पर धूम्र रंग से
कविता बनकर रह जाना..
हे ईश्वर..
किसी प्रेम का ऐसा भाग्य न हो

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16 NOV AT 11:31

मुझे तुम्हारा कंधा भी चाहिए तो
मंदिर की सीढ़ियों की तरह...

जहां बैठे रोना सहज हो,
अपनी तकलीफ़ बताते हुए
प्रार्थना की जा सके,

और जहां स्थानांतरित हो सके
मेरे हर दु:खों का भार!!

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16 NOV AT 10:02

दुःख की कोई गरिमा नहीं होती, ना सुख की कोई गहराई... दोनों अपनेआप में स्वयं परिभाषित है लेकिन, उनकी दोनों की तस्वीरें खींची जा सकती है किसी की आँखें देखकर....

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13 NOV AT 9:43

इश्क़ पहचान लेता होगा शायद हफ्ते में से इतवार की आहट को,
थोड़े देर से भी उठते हैं और इस दिन चाय से थकान भी नहीं जाती,

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13 NOV AT 9:21

साँझ की गोधुली के हाथों से रात की चाबी लेकर जब चाँद आकाश में उतरता है तब उसके अकेलेपन की उदासी से सपने उसकी नींद चुरा लेते हैं... और सितारों के बीच अकेला चंद्रमा रातभर टहलकर यात्रा करता है सुनहरी धूप को खोजने में! बस इसी खोज की यात्रा को जीवन कहते हैं....

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12 NOV AT 9:13

कौन कहता है
समय के साथ
सब ठीक हो जायेगा

अब तुम्हारे घर
मेरे ख़त नहीं आएंगे कभी
और मेरे घर
कभी बसंत .....

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11 NOV AT 18:38

लोगों की मुस्कान से ले कर पुरे ब्रह्मांड तक फैला हुआ होता है सुख!! इस सुख की सीमाएं नहीं होती...
दुःख का क्या है वो अक्सर सिमट जाता है
घर की चार दिवारियों में तो कभी मयखाने में
कभी एक प्याली चाय के कप से हो कर सिगरेट के धुएँ में...कभी आँखों में बैठ कर रह जाता है
तो कभी किताबों के पन्नों पर...

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