मेरी कलम से... आनन्द कुमार  
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शब्दों से कुछ-कुछ कह लेता हूं...
Joined 10 April 2018


शब्दों से कुछ-कुछ कह लेता हूं...
Joined 10 April 2018

हुनर होती कहां सब में,
जो पलट दे बाजी,
एक दांव पे,
हैं नेता ये,
तराशते हैं ये,
तलाशते है,
कलाकारी और कलाबाजी,
मौका परस्त की राजनीति,
में हुनरमंद हैं ये,
नजरबंद है ये,
इन्हें मतलब से है यारी,
न दर्द से है रिश्ता,
इनका समाज से,
तभी तो देखो,
आजतक न समझ सका,
रिपब्लिक भारत,
इन नेताओं के,
भेड़िया चाल को,
जाति धर्म के बाद,
खुद उलझ बैठी है,
मर्यादा, प्रेस की,
चौथा स्तंभ संविधान की।

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मैं नन्हां हूं,
मेरा जज्बा ना देखना,
देश के लिए पिता खोया हूं,
मेरा हौसला ना देखना।
तेरे सितम का बदला लूंगा,
चुन-चुन कर,
"मैं तुषार हूं",
मुझे कमजोर ना समझना।

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बड़ी बेवफा निकली तुम, मेरी नींद खराब करके ना जाने तुम्हें कैसे नींद आयी होगी,
इधर तेरे इन्तज़ार में, करवट बदलते बदले, बिस्तर की सिलवटों में दरार आ गयी।

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अगले जनम मोहे,
बिटिया ना कीजो...

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अपनी व्यवस्था को सुधार ऐ "सरकार ए गालिब",
क्यों किसी को नेता बनाने के लिए बेवजह तुली है।
ये जो चन्द दूरियों पर तेरे "थाने और हैं हवालात",
सच में सारी कमियां इन्हीं के दरम्यान पड़ी है।
अगर यह ईमानदार हो जाएं तो, सच कह रहा हूँ,
जो तू आज मुश्किलों में है, ना आए ये घड़ी है।
हां एक कोशिश सीने पर पत्थर रख कर करनी होगी,
पुलिस की जांच में राजनीति की चासनी को दूर रखनी होगी।

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लाश तुम्हें देनी चाहिए थी,
परिजन को अंतिम संस्कार को,
और सलामी खाकी से करवाकर,
बचाने चाहिए थे बेटी के अंतिम सम्मान को।

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आखिर कब तक,
ऐसे बेटियां शहीद होती रहेंगी,
कब तलक खाकी, खादी,
ऐसे ही कलंकित व शर्मशार,
होती रहेगी।

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दिल गुलाब हो गया, बाग़ बाग़ हो गया,
आपके प्यार में, ज़ान निशार हो गया।
तुमसे नज़रे मिली, दिल ने दिल से कही,
आज मुद्दतो बाद, कोई खाश हो गया।
सोचता हूँ कि कैसे करूं, दिल की बात,
वो समझा ही नहीं, हमें प्यार हो गया।
डर भी है चाह भी, प्यार कि ख़ामोशी भी,
दिल मेरा आज, किसी का बेन्तहा हो गया।

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कभी कभी,
जो ऐसे आ जाते हो,
सचमुच, ना जाने क्यों,
मुझको भा जाते हो।
कभी कभी,
जो अपनों के संग,
उमंग और तरंग में,
खो जाते हो,
सचमुच, जीवन की,
निश्छलता को उड़ेल जाते हो।
कभी कभी जो,
सहेजे हुए शब्दों से,
मुझे जोड़ जाते हो,
सचमुच, मेरे अंतर्मन को,
प्रेम से जोड़ जाते हो।

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बचपन तेरी कहानी का, नहीं है कोई मोल ,
यादों का तू कोना है, दिल का बस सलोना है।
तेरी हमदर्दी का मै कायल, सत्य यही बस होना है,
तुझ तक अब जाऊं कैसे, तुमको मैं पाऊं कैसे,
है तो सबकुछ फिर भी, तुम बिन जीवन सुना है,
वो नटखट वो शैतानी पन, उछलकूद व दीवानी पन,
मौजों की रवानी थी ऐसी, जीवन बचकानी थी जैसे,
याद बहुत तुम आते हो, तन्हा-तन्हा रुलाते हो,
जिऊं तुमबिन कैसे मैं, क्यों न कुछ बताते हो,
बचपन फिर क्यों न तुम, पुनः लौट के आते हो।

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