मेरी कलम से... आनन्द कुमार  
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शब्दों से कुछ-कुछ कह लेता हूं...
Joined 10 April 2018


शब्दों से कुछ-कुछ कह लेता हूं...
Joined 10 April 2018

ज्यादा नासमझ, थोड़े चालाक हो तुम,
जिंदगी के जद्दोजहद से, ना इत्तेफाक हो तुम।
उम्र कच्ची है, सोच बस है बड़ी तुम्हारी,
सच और झुठ में बस गुमराह हो तुम।

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तुम रोते हो तो दर्द बहुत होता है,
तुम हंसते हो तो खुशी बहुत होती है।
तुम मुझे भी थोड़ा हंसाया करो,
बस हर बार, बार-बार हंस जाया करो।

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जीतना जिसका शगल हो,
हारना वह क्या जाने।
आशाओं की पंख है वह,
उड़कर गगन छूना जाने।
मंजिल, सफर सब,
आसान है उसके लिए।
कदम जिसके जमीं पर,
उम्मीदें तारों से वफा मांगे।
सब़ा है, है सब्र की फना,
जो चाह दे, वह मुठ्ठी में भरना जाने।

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तुम बिन उदास जिंदगी,
तुम बिन उदास मन है,
तुम बिन जीवन के कोना कोना से,
जाने क्यों अनबन है।

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तेरी बर्बादी में मेरा गुनाह नहीं,
मैं तो तेरी आरजू से इश्क रखता हूं।
चाह है कि हर आह रोक दूं तेरी,
बद्दकिस्मती है तुमसे दूर रहता हूं।

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क्यों कैसी, किसके लिए है,
ये "वेदना",
जिसके "मन" में "प्रेम" नहीं,
उसके प्रति फिर क्यों,
ये कैसी "चेतना"।
"दर्द", "तड़प", "मोह",
किस बात की,
जो मर चुकी,
वो "जज्बात" किस काम की।
"अर्ज", "फर्ज", "मर्ज",
किसके लिए,
"धर्म" की जो कर रहा हो,
"अवहेलना"।
"सत्य" निर्लज,
हो नहीं सकता कभी।
"प्रेम" में हो जब,
"अटूट" "सम्वेदना"।।

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मुहब्बत की दुनिया के सलीके बदल गये,
चाहते, रस्मों व अंदाज के तरीके बदल गये।
इम्तेहान के ढंग नहीं मायने बदल गए,
वफा खुद जो करते नही, वफा के उनके ढंग बदल गए,
अजीब रस्म है मुहब्बतें दर्द का, अजब रवायत है,
मै जैसा वैसा ही हूँ, पर वो न जाने कब बदल गये।

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हो शत् कर्म हमारे,
ना किसी के हक को मारे,
दे ना किसी को धोखा,
मन में सोचे सभी का,
हां यही नववर्ष है,
हां यही नववर्ष है।।
प्रेम पथिक हो रास्ता,
दुर्जन से, ना हो वास्ता,
अपने धर्म का कर्म हो,
औरों के धर्म का मर्म हो,
हां यही नववर्ष है,
हां यही नववर्ष है।।
कोशिश कर लो लाख झूठ से,
सफलता अंत में सत्य से ही पाओगे,
अच्छा करके अच्छा पाओगे,
बुरा करके यहीं भर जाओगे,
हां यही नववर्ष है,
हां यही नववर्ष है।।

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हम आ तो जाएं,
इन ख्यालों का क्या,
हम आ तो जाएं,
इन नया-पुराना,
सालों का क्या,
हम आएं तो आएं कहां,
बस यह बतला दो,
जब हर पल तेरे ही पास हैं,
तो आखिर आएं कहां।

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उन्हें आदत है यूं ही बेवफाई की,
गरज कर, बरस कर, रुसवाई की,
वे शासन है, सत्ता है, उन्हें हुकूमत आता है,
उन्हें क्या मतलब है, जनता की मोहब्बत व जुदाई से,
उन्हें तो फिक्र है बस अपनी, सलामती की,
रुपए की, कुर्सी की और तानाशाही की,
वह यह मत भूलें, गर्जना और बरसना हमें भी आता है,
हम "जनता" है जानते हैं "ताकत'' अपनी "भलाई" की।

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