इधर आ सितमग़र
हुनर आज़माएंँ
तू तीर आज़मा
हम जिगर आज़माएंँ-
जिस की उम्मीद ना थी अब वो काम होगा
सारा मोहल्ला ख़ुशियाँ मनाएगा
और नाम हमारा बदनाम होगा
कोई तो इन्तेहा होगी इन इम्तेहानो की
या फ़िर सारी उम्र हमारा
इसी तरह इम्तेहान होगा-
भेद भाव तो हमे सबसे पहले मंदिर में सिखाया जाता है...
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती पिता महा देवा
इस आरती में एक लाइन है
"बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया"
क्यों भाई पुत्री क्यों नहीं... असल में यह होना चाहिए
बांझन को "सन्तान" देत निर्धन को माया
विचार कीजियेगा 🙏🙏-
यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां,
मुझे मालूम है पानी कहा ठहरा हुआ होगा।
कई फा़के बिताकर मर गया, जो उसके बारे में,
वो सब कहते अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा।
गज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सब के सब परेशाँ है वहां क्या हुआ होगा।-
मन बैरागी तन अनुरागी,
कदम कदम दुश्वारी है,
जीवन जीना सरल ना जानो,
बहुत बड़ी फनकारी है,
औरों जैसे होकर भी,
हम बा-इज़्ज़त है बस्ती में,
कुछ लोगों का सीधापन है,
कुछ अपनी अय्यारी है।।-
मैंने दीवार पे क्या लिख दिया
"खुद को एक दिन"
बारिशें होने लगी मुझ को मिटाने के लिए-
गलतियां भी होंगी और ग़लत भी समझा जाएगा
यह ज़िन्दगी हैं जनाब
यहां तारीफ़ भी होगी और कोसा भी जाएगा-
दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की
शायद खबर नहीं थी हमे सही नुस्खे की
इन्तेहा तो तब हुई इस दर्द की
जब अपने ही वजह निकले इस दर्द की
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बहुत याद आती हैं वो हिचकियाँ
जो बता देती थी कि किसी ने याद किया है
अब तो बस आसुओं का सहारा है
क्योंकि हर रिश्ते ने मेरे साथ धोका किया है-
मुद्दतों से हम एक उम्मीद लिए बैठे थे
किसी कीमत पर ही सही, उसको हँसी तो आए
दुख तो हुआ हमे जब आयी उसके चेहरे पर मुस्कान
क्योंकि वो किसी और को अपनी गोद में लिटाए बैठे थे
लगा लिया गले से हर ग़म को हमने चुपचाप
उसे क्या पता हम अपना सबकुछ लुटाए बैठे थे
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