Lafz Kuch Ankahe   (Lafz_Kuch_Ankahe)
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Joined 15 March 2018


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Lafz Kuch Ankahe 18 HOURS AGO

(अनुशीर्षक में पढ़िए)

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Lafz Kuch Ankahe 16 FEB AT 1:06

We meet two types of people in life. Firstly, the ones who press upon us to make us believe, we can't fly. These people, ultimately teach us, how to fly, without them. Secondly, the ones who let us fly. They teach us, how high to fly.

We need both. To have the apt skill and altitude.

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Lafz Kuch Ankahe 7 FEB AT 11:19

ख़ुशनुमा लिखते रहो,
मुस्कुरा मिलते रहो;
गिले किताबों में दबा रखते रहो,
मरो भी तो ऐसे कि खुद में ही घुटते रहो।

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अपने मन की लिखना गुनाह है क्या!!?

#lafzkidiary

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Lafz Kuch Ankahe 6 FEB AT 23:55

सुनो, अब पाँव लड़खड़ाते हैं।
बहुत वक़्त हुआ, चलते हुए।
छाले दिखाए नहीं कभी तुम्हें।
पक गए हैं, अब शायद।
एक वक्त आता है ना,
जब चीज़ें ख़राब हो जातीं हैं,
इतनी की काम बनाना तो दूर,
बिगाड़ने लगती हैं।
कुछ वैसे ही,
अब ख़्वाब लड़खड़ाते हैं।
ज़ख्म छुपाने की एक हद हुआ करती है,
वक़्त से साफ ना हों, तो त्रासदी होती है।
कुछ ऐसा ही है।
अब कदम लड़खड़ाते हैं,
फैसलों से।
कुछ जिगरियों को खोने से।
दिल बहुत करता है पूछने का,
कितना और?
पर सुनो, अब ज़मीर लड़खड़ाते हैं।

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❤️

#lafzkidiary

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Lafz Kuch Ankahe 6 FEB AT 23:42

ख़ैर फ़िर, हक़ किसका ज़्यादा, छोड़ कर;
हाथ दोनों जोड़ कर, निकल लेते हैं वो।
जो ज़माने से किया करते थे, होड़ हर मोड़ पर।

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अब, क्या करें!

#lafzkidiary

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Lafz Kuch Ankahe 6 FEB AT 23:27

....

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कुछ बेचैन रातों पर 💔

#life #friendship #lafzkidiary #majormissing

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Lafz Kuch Ankahe 6 FEB AT 13:31

With time passing by, I understand,
it's easier to hate than to love.
Love, requires efforts, hate doesn't.
Let's accept, we're all lazy,
when it comes to efforts.
It is rare, that we go beyond
our limits to help others.
So is love. Rare!

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On love and hate ❤️

#love #lafzkidiary

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Lafz Kuch Ankahe 5 FEB AT 22:01

सफ़र में कईं शहर पीछे छूट जाया करते हैं;
कुछ को छोड़, आगे बढ़ना, मजबूरी बन जाती है।

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समय, परिस्तिथियाँ इन्हीं में बंधे हैं हम आप।

#lafzkidiary #friendship #sheher

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Lafz Kuch Ankahe 1 FEB AT 13:15

टूटना ज़रूरी है,
फिर बिखरे हिस्सों के जुड़ने के लिए।
अपने आप को स्वीकृत करने के लिए।
अपनी भूलों को अपना कह पाने के लिए।
पुरानी मुसीबतों से ज़्यादा कठिन,
चुनौतियों को चुनौती दे पाने के लिए।

टूटना ज़रूरी है।
फ़िर जुड़ने के लिए।
फ़िर सम्पूर्ण होने के लिए।

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Lafz Kuch Ankahe 31 JAN AT 0:17

चीज़ें कभी अजीज़ होंगी।
अपने पास भी कभी वो,
सामने शीशे के शोरूम में लगी,
बेशक़ीमती कमीज़ होगी।
ये सोच कर,
मन ही मन इठला कर,
वो चल पड़ते हैं,
हवाई बातें बना कर,
बातें, जहाज़ों की उड़ान से कईं ऊँची,
ठीक सपनों की तरह।
फ़िर अधूरे से सपनों से,
कुछ कमाए हुए रूपयों से,
चलते हैं खरीदने कमीज़ वही।
कमीज़ मिलती हैं, अब बहुत।
वो अजीज़, कल जो बढ्ढों को सुना करते थे,
वो यहाँ साथ दिखते नहीं।
उँगलियों भर के फाँसले,
पर सामने हर सुबह दिखते नहीं।
ऐसे में इक ही ख़्याल आता है हर कहीं,
क्या रुपया? क्या कमीज़? क्या अजीज़?

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