Lafz Kuch Ankahe   (Lafz_Kuch_Ankahe)
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Joined 15 March 2018


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Lafz Kuch Ankahe 16 HOURS AGO

उसके चंद पन्ने पढ़,
उसकी दिन भर की पढ़ाई आँक,
तुम जो मन ही मन खुश हो जाते हो,
कभी आख़िरी पन्ने तक की सैर पर निकलना,
कभी उसके नज़रिए से चीज़ों को परखना,
कभी उसे 'वाकई' जानने का दावा करना।

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Lafz Kuch Ankahe 22 MAY AT 13:00

फ़िर ये रिश्ते एक दिन, एक अधजली किताब से हो जाएँगे,
और साबुत किताबों में किसी को, उतनी दिलचस्पी नहीं होती।

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Lafz Kuch Ankahe 21 MAY AT 15:48

कड़वी सच्चाइयों को अपनी मीठी हिदायतों से जो निरस्त कर दे,
वो जिस माहौल में हो, उसे मदमस्त कर दे।

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Lafz Kuch Ankahe 21 MAY AT 12:56

तेरी कहानी के गिलों में,
मेरा भी एक किस्सा ना हो,
इसलिए इस कहानी से अपना हिस्सा,
लिए चले जाना ही मुनासिब लगा।

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Lafz Kuch Ankahe 20 MAY AT 10:20

कभी बिना चले ही,
मीलों का सफ़र तय किया सा लगता है।
तो कभी चल कर भी,
आख़िरी बार कब चले थे, याद नहीं।

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Lafz Kuch Ankahe 19 MAY AT 23:03

सीप में छिपे मोती सी हूँ,
जिसका मोल सीप के बाहर ही है।

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Lafz Kuch Ankahe 19 MAY AT 9:35

और फ़िर इक जंग सी छिड़ जाती है,
इक जान के दो किरदारों में।
तलवारें खिंच जाती है मैदान में,
इक लड़ाई लड़ी जाती है,
साख और स्वातंत्र्य में।
और सुनो याद रखना,
जंग में जीत एक ही पल्हदे की होती है।

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Lafz Kuch Ankahe 16 MAY AT 11:10

हिफ़ाज़तीं उन हिदायतों का मोल बावरा ये मन क्या समझे,
किफ़ायत तलाशने का दौर थमने का नाम ही नहीं लेने देता।

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Lafz Kuch Ankahe 15 MAY AT 0:14

रूह की उन सिली सी तहों को,
आज ज़रा आज़ाद करते हैं,
तराजू के उस पलहड़े पर बैठे,
अकेले अंजान कैदी की,
आम-सी पहचान करते हैं।
कोई अकेला है नहीं राह-ऐ-मंज़िल यहाँ,
चलो आगाज़ ये सरे-आम करते हैं।

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Lafz Kuch Ankahe 13 MAY AT 15:06

पतझड़ में तुम्हारा आँचल छोड़ते उन पत्तों को,
आज टूट जाने दो,
हवा को आज उन्हें सकेर कर,
तुम्हारे पास ले आने दो।
खाद बन जाए वो खेद का स्वाद,
नईं पत्तियाँ फ़िर उग आएँगी,
पुरानी भूलों का ज़ायका ज़रा समझ तो जाने दो।

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