Lafz Kuch Ankahe   (Lafz_Kuch_Ankahe)
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Joined 15 March 2018


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Joined 15 March 2018
Lafz Kuch Ankahe 8 OCT AT 10:14

मेरी आँखों में अब देखा ना करो,
असहमति अब,
मुझसे छुपाई नहीं जाती।

जब बातें मन-मुताबिक़ ना हों मेरे,
मैं पलकें झुका लेती हूँ,
असहमति ही तो है,
बगावत थोड़ी, तो दिखाई नहीं जाती।

ज़ुबाँ चुप ही रहती है मेरी,
वो तुम्हें आदत नहीं ना असहमति की।
तो सिर हिला देती हूँ मैं,
वो क्या हैं ना, ज़ुबाँ से मेरी,
झूठी सहमति दिखाने की ज़हमत उठायी नहीं जाती।

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Lafz Kuch Ankahe 27 SEP AT 17:19

(कविता, अनुशीर्षक में)

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Lafz Kuch Ankahe 21 SEP AT 18:05

मैं काफ़िलों के इंतेज़ार में बरसों बैठा रहा,
फ़िर ख़बर आयी कि उस ओर का मुसाफ़िर, इक मैं ही था।

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Lafz Kuch Ankahe 21 SEP AT 16:24

कुछ ख़्वाब सुलगते से,
आँच चाहे मिले,
या नहीं
पर यक़ीन हैं,
एक दिन,
हक़ीक़त होंगे।
हौसलों की कढ़ाई में,
मेहनत की खुशबू लिए।

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Lafz Kuch Ankahe 14 SEP AT 15:04

जो जगह, जो लोग मुझे, मुझ-सा अपनाते नहीं,
क्या हक़ है उन्हें, हदें तय करने का मेरी?
बस यही बतलाते नहीं।

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Lafz Kuch Ankahe 14 SEP AT 14:38

नए, पुराने, हर युग की याद दिलाती है;
एक हिंदी ही तो है अब बाक़ी, जो हिन्द की याद दिलाती है।

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Lafz Kuch Ankahe 13 SEP AT 17:37

ख़ामोशी कुछ पसंद है मुझे,
तुम एक थिरकती ताल हो।
ख़ुश मैं भी हूँ,
तुम भी खुद में कमाल हो।
जब सामना हुआ करता है,
मेरी खामोशी और तुम्हारी ताल का,
तुम मेरी खामोशी को बोरियत,
और मैं तुम्हारी ताल को शोर समझ,
निकल पड़ती हूँ,
अपने ख़्वाबों की दुनिया में।
जो तुम अक्सर मेरी ख़ामोशी,
समझ लिया करती हो।

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Lafz Kuch Ankahe 10 SEP AT 0:49

कुछ वक़्त मेरा इस उलझन में भी बीत जाता है,
वो मौके शिकायतों के नहीं छोड़ते,
या मिजाज़ मेरा ही कुछ शिकायती हुआ जाता है।

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Lafz Kuch Ankahe 10 SEP AT 0:22

आज जान कर भी अनजान बन जाओगे,
कल जब दुनिया जानेगी, हमसे जोड़कर अपनी पहचान बताओगे।

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Lafz Kuch Ankahe 8 SEP AT 15:55

एक वक़्त हुआ करता था,
जब किसी की माँ,
सबकी माँ-सी हुआ करती थी।

अब, माँ की ममता,
अपने बच्चों पर ही कुर्बान दिखती है।

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