कैलाश नवहाल   (कै. सु. न)
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Ambitious
Lazy
Ascetic
Joined 27 June 2017


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ना मेरे काम की वो
हिज्र के अंधेरे में
तड़फ जाम की जो

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विरह गिर
अवरोध प्रेम का
दुर्गम पथ

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कुछ ठहरा सा रहता है
मेरे मन की सीमा पर
बस तेरा पहरा सा रहता है

यूँ तो पराई लगती है दुनिया
पर तुझ से ताल्लुक़ गहरा सा लगता है

तन्हाई के आगोश में बैठ सोचता जब भी
हर ओर बस तेरा चेहरा सा लगता है

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मुख पर श्वेताभा का अधिपत्य
तुम और शिव दोनों ही सत्य
निर्मल मन तुम्हारा एक उद्गम
जहाँ से निकले अत्यंत प्रेम पय

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प्रथम मिलन की स्मृतियों में
अभी तक भी अधिष्ठित है
लगता है भाग्य की मंत्रणा
मेरे ही ह्रदय हित है

तरस रहे इन नयनों को
पल की ही इच्छा पूर्ण हो
फिर समय की गणना भी
एक बार तो अघूर्ण हो

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अतल सागर सी आँखें है, और मुख भी नूरानी है
वाणी की मिठास भी प्रिये, ज्यों गंगा का पानी है
यूँ ही ना डूबा हूँ मैं तुम्हारे इश्क़ के समंदर में
रब ने भी लगता है की, दोनों के मिलन की ठानी है

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तुम्हारे रुप मद्य की मादकता में
ज्यों मंत्रमुग्धता है प्राजक्ता में
मैं हर क्षण तुम को स्मरण करूँ
तेरे स्मृति नगर में विचरण करूं

तुम श्वेत ज्यों गिरिराज का तुषार
तुम सरल, श्रेष्ठ तुम निर्विकार
तुम में दिव्यता भी तो तो वास करे
मुख उज्जवल हर्ष आभास भरे

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तन्हाई के आलम में
तुम ही बहार हो
मन के एकाकीपन में
समग्रता का विचार हो

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तुम और मैं, वाह जीवन का क्या अद्भूत सफर होगा
होंगे चंद लम्हें, हसीन नज़ारे और बस सब्र होगा

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कुसुमासव ही बहता तुम्हारी वाणी में
प्राण प्रतिष्ठा करता जो मृत प्राणी में

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