Jayshree Rai   (जयश्री राय"सांकृत्यायन")
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Joined 23 August 2020


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Joined 23 August 2020
3 NOV AT 21:23

जीवन पर्यन्त की दीपावली
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हर साल,दीपावली आती है।
हर साल, वस्तुओं के धूल,
झाड़ दिए जाते हैं।
और बन्द कर दी जाती है,
दीवारों की दरारें।
हर साल ,रंगहीन वस्तुओं को,
रंगीन किया जाता है।
फिर जलते हैं असंख्य दीप
एक रात्रि के लिए,
एक साथ ,चारों ओर।
और कल के सूर्योदय के साथ,
होता है, दीपावली का समापन।
किन्तु इस बार, झाड़ कर देखना,
उस धूल को ,जो मन में जमी है
और बन्द कर देना,रिश्तों की दरारें।
रंगहीन भावनाओं को, रंगीन कर देना,
और जला देना एक दीया, प्रसन्नता के नाम।
एक दीपक प्रज्ज्वलित करना,
बुराइयों के चिता के लिए।
और मन के अंधकार में,
एक दीप ज्ञान का जलाना।
और देखना,
ये दीप, जीवन पर्यन्त जलते रहेंगे।
इस दीपावली के ,समापन का सूर्योदय,
कभी नहीं होगा।।
- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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7 OCT AT 19:38

अदृश्य होती सभ्यता
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काट दी गई शाखाएँ,
मर्यादा की।
सभ्यता,जो घर की सदस्य थी,
वो चली गई बैठ कर,
पूर्वजों की अर्थी पर।
वाणी में जो शहद था,
वो परिवर्तित हो गया
मधुमक्खी के दंश में।
लोग ढल गए,
दिखावटी जिन्दगी में।
चेहरे पर सजावट के रंग ,
हर रोज लगाए गए,
जिससे झुलस गई परत
शालीनता की।
बस दिखती है,
अदृश्य होती सभ्यता।
यकीन मानो,
संस्कार गिर गए हैं,
ज़मीन पर।
जो पल्लू ,सिर पर इतराता था,
अब वो टकराता है,
पैरों से।।
- संकल्प अनुसन्धान योगपथ

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17 SEP AT 19:06

तुम कौन हो?
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शब्द तुम्हारे गूँज रहें हैं,
फिर भी तुम स्थिर,मौन हो।
इतना मुझे सामर्थ्य दो ईश्वर,
कि बता सकूँ तुम कौन हो?
अभी इतना ही कह सकती हूँ,
हृदय में स्थित आत्म हो,
विद्याओं में अध्यात्म हो।
दुनिया का आदि-अन्त हो,
ऋतुओं में तुम्हीं बसन्त हो।
इन्द्रियों में मन-मनन हो,
प्राणियों में चेतना।
हर्ष हो उल्लास हो,
समृद्धि और वेदना।
शास्त्रधारी में राम हो,
पुण्यों में चारों धाम हो।
तुम्हीं सनातनी आर्य हो,
कवियों में शुक्राचार्य हो।
पांडवों में पार्थ हो,
जीवन का परम् यथार्थ हो।
सूक्ष्म हो ,ब्रह्माण्ड हो,
वाणी हो और तुम मौन हो।
इतना मुझे सामर्थ्य दो,
कि बता सकूँ तुम कौन हो।।
- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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23 JUL AT 19:10

मुट्ठी बाँधे आए जग में,
हाथ पसारे जाना है।
सच पूछो तो एक ही मन्जिल,
धर्मार्थकाममोक्षाय एक निशाना है।
अज्ञान मार्ग से सुख शांति,
कैसी है ये मूढ़ भ्रांति?
मन मस्तिष्क का निरन्तर युद्ध,
अवचेतन मन के विरुद्ध।
जीते तो मन बिल्कुल शुद्ध,
जूझना ही होगा हे मानव प्रबुद्ध।।

- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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20 JUL AT 9:40

नदिया एक घाट बहुतेरे,
मिलता उसे जो जगें सवेरे।
कल और कल का रखता ध्यान,
आज का करें हर पल सम्मान।
प्रत्यक्ष देवों को निज करें प्रणाम,
सचमुच वह है कुल की शान।
जिसने स्व को स्वयं जगाया,
उसने जीवन सफल बनाया।।

- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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14 JUL AT 10:55

आज जो बिखरी मरघट की हड्डी,
कभी खेलती थी जंग कबड्डी।
जीवन के हैं विविध रंग,
हर पल छिड़ा अनोखा जंग।
अपने से खुद लड़िये,
अपनों का क्या है दोष?
अज्ञानता की खाई में
पड़े हैं क्यों मदहोश?
अहंकार को उखाड़ फेंकिए,
तब प्रगति की राह देखिए।।

- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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1 JUL AT 11:43

मुकरियाँ
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आकर सबके जीवन में,
दूर करे हर रोग,
क्या भाई दवा ?
नहीं भाई योग।।


खतरनाक और बहुत बुरा है,
भरा हुआ उसमें प्रतिशोध,
क्या सखी राक्षस?
नहीं सखी क्रोध।।

- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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19 JUN AT 16:34

जिन्दगी बाधा दौड़ है,दौड़ना तो हमें ही पड़ेगा,
क्योंकि राहों की रफ़्तार स्विफ़्ट नहीं होती।
बैठ कर छूना चाहते हैं जो मंज़िल को,वो ठहर जाते है,
क्योंकि ज़िन्दगी के मंज़िल में लिफ़्ट नहीं होती।।


- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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10 JUN AT 11:29

पावन धरा बनाने को ,हर बेटा फिर से राम बने,
नाश बैरियों का करने को गोकुल का घनश्याम बने।
जो भी जंग लड़ेंगे हम,जीत हमारी निश्चित है,
गर भारत माँ का हर बेटा अशफ़ाक,हमीद, कलाम बनें ।।


- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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26 MAY AT 11:15

जीवन का पहला संकल्प,
सबसे पहले काया-कल्प।
पहला सुख निरोगी काया,
दूर रखिए प्रपंच और माया।

नित योग और प्रार्थना करिए,
लक्ष्य के लिए जागते रहिए।
मन,कर्म,वाणी रखें पवित्र,
मोती सा चमके चरित्र।।

- संकल्प अनुसंधान योगपथ

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