ये कैसी कश्मकश है!
दिल कुछ और कहेता है और दिमाग कुछ और,
ये मन के सन्नाटे दिल को चीर देते है,
एक जंग मन के भीतर चल रही होती है,
चहेरे की रोनक न जाने कौंन से ख्यालो की दासी होकर बैठी है!
हजार सवाल सुलगते है ये बंध लबो के पिछे,
फिर भी चहेरे पर सुकून की लकीर को सजाये रखते है,
ख्वाहिशो की सिलवटो़ में हकीकत के पन्नें दफन है,
पता नहीं कौन सा सैलाब मुझे बहां ले जाने को मजबूर है,
मुजे चिखना है,चिल्लाना भी है,
पर पता नहीं किसी खामोशी नें मेरे सारे अल्फाज़ छिन लीये है.
हेमांगी-
27 OCT 2021 AT 21:46