27 JUN 2020 AT 18:20

याद भी बाकी नहीं
कुछ इस तरह वो जिंदगी में शामिल हुआ था,
जेसे आहिस्ता आहिस्ता फूलों को भवरे ने चुमा था.

इश्क सर चढकर बोल रहा था,
उसका नशा दिन दूगनी रात चोगूनी छा रहा था,

आहिस्ता आहिस्ता वो उब रहा था मेरे इश्क से,
जिसे मेने समजा था इश्क का पूजारी,
वो तो निकला हुस्न का जुआरी.

सबकुछ बिखर गया ,वक्त ठहर सा गया,
अब तो उसकी याद को भी ए याद नहीं,
दूर दूर तक उसकी अब कोइ बात भी नहीं.
हेमांगी

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