वो इश़्क का क्या मज़ा जो मंज़िल पा जाये,कुछ कहांनिया अधूरी रहेकर ही मुकम्मल होती है.हेमांगी -
वो इश़्क का क्या मज़ा जो मंज़िल पा जाये,कुछ कहांनिया अधूरी रहेकर ही मुकम्मल होती है.हेमांगी
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