वैसे घर के हर हिस्से से वो वाकिफ होती है ,
पर कुछ कोनें उस की पहचान बन जाते है,
जब से वो ब्याहई गई होती है तब से लेकर जिंदगी की छाँव तक हर बार वो उस कोनें में ही नजर आती है,
वैसे त्योहार हर किसी के लिए होता है,
पर कुछ स्त्रीओ के लिए त्योहार नहीं होते,
कभी कभी कुछ निगाहे हर दम उसे नापती रहेती है,
जब भी वो कुछ काम करती है कुछ निगाहे उसके आसपास ही रहेती है,
धीरे धीरे एक उम्र के बाद उसकी अंदर की स्त्री मरना शुरू कर देती है,
धीरे धीरे रंगो से परेज होने लगता है,
जो कभी उसके लिए खास रंग था वो अब आम सा बन जाता है,
बाते तो वो बहोत करती है पर खूद से,
अपने भीतर कैद की हूई और जो धीरे धीरे मर रही होती है उस स्त्री से,
उस से भी कभी कभी मन करता है छोटी बच्ची बन जाने का,
जोर जोर से गाना गाने का,चिखना ,चिल्लाने का,
पर न जाने आवाज़ अपने आप में कैद हो गई है,
शायद अब वो भी कहीं खो रही है.
हेमांगी— % &-
11 FEB 2022 AT 17:19