28 AUG 2021 AT 17:53

शाम के साहिलों पर
यादो का सैलाब टकराता है
बंध मुठ्ठी से गुज़रा वक्त फिसलता है
हज़ार ख्वाहिशो की कश्तियां दिल के साहिल पर टकराती रहेती है
ना बहती है ,ना कहीं रुक पाती है
हम भी चाहते थे साहिल पर दोनों का नाम हो
पर कमब्ख्त लहेरों ने तुमे पुकार लिया है.
हेमांगी

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