4 JUN 2020 AT 18:43

शाम होते ही
शाम होते ही आसमां ने जेसे सिंदूरी मांग सजी हो ऐसा लगता है,
चांद अपनी चांदनी संग ,
तारों की महेफिल सजाऐ बैठा हो,
उपर से ये ठंडी हवा का जोखा,
सिंदूरी शाम को अपनी बांहों मे छुपाकर लिपट जाता है,
जेसे जेसे शाम बढती है,
चांद चांदनी की मदीरा पी कर झुमती है,
और रात की आंखों मे मदीरा का नशा बढता है.
हेमांगी

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