शाम होने वाली थी-
उसके इन्तजार मे,
मैं टूक टूकी लगाऐं दरवाजे पे खडी थी,
दिन ढल रहा था,
सूरज पर चांद का पहरा बढ रहा था,
मंद मंद हवा बह रही थी,
आसमान मे सिंदूरी शाम खिल रही थी,
अब रात ढल ने मे वक्त कितना था!
पर मेरे आंखों का नूर कहा खोया था?
वक्त की सूइ को किस ने थाम लिया था?
अब ये शाम का इन्तजार रोज होना था.
हेमांगी-
11 MAY 2020 AT 19:14