रेत पर लिखा था कुछ.
शाम का जो आलम था,
दरिया की लहरों के संग मंद मंद हवा का पहरा था,
उडती जुल्फें , भीगे थरथराते होठ,
छम छम बजती पायल,
हिरणी शी चाल,
आंखों में है किसीका इन्तजार,
हल्के से आके बैठी किनारों संग,
उंगलियों से लिखा रेत पर उसका नाम,
कहीं कुछ कमी थी इश्क की कशिश मे,
जो मिट गया रेत पर लिखा उसका नाम.
हेमांगी-
1 JUN 2020 AT 9:11