रात की रहगुज़र पर.
रात की रहगुज़र पर नजरों को बिछाऐ बैठे हैं हम,
रात आज जागती रही और तेरे खयाल सो गए,
कुछ खवाबों का माथा चुमकर तेरी याद कहीं सो गई,
तेरे इश्क़ ने जो जख्म दिऐ थे वो तेरी यादों से मेने सिल दिऐ है,
वो तेरे इश्क़ का गुमनाम पन्ना रात की किताब में छिपाकर रखा था वो आज फाडकर फेंक दिया है,
अब रात की रहगुज़र मैं एक ठहराव सा लगता है,
तेरे इश्क़ का बोझ अब आंखों को नहीं दे रहे,
अब रात जगती है और तेरी यादें सो रही है.
हेमांगी-
16 JUN 2020 AT 22:13