28 DEC 2021 AT 0:21

रात खामोश सी थी,
पर मेरे मन का शहर जग रहा था,
बाहर सन्नाटा था,
पर मन के बाजार में बहोत शोर मचा था,
कुछ ख्वाब एक दूजे को सता रहे थे,
ओर निंद ने भी अब खिवाबो से किनारा कर लिया था,
सब सो रहे थे,
और मन जग रहा था,
कुछ सवाल भी अब बहोत बबाल मचा रहे थे,
पर दूर तक कुछ दिखाई नहीं दे रहा था,
सिवाय इंन्तजार के,
और अब भी वो इंन्तजार जारी है,
बेवक्त हर वक्त.
हेमांगी

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