ओ प्यारे मन
ओ प्यारे मन तु इतना क्यूं उछल कुद करतां है,!
ना किसीकी सूनतां है ना ही कुछ करनें देता है,
खामखा अज़ीब से वहम पाल लेता है,
पर हा बंदा तु भी कमालका है
जब भी कुछ खूसे ठान लेता है तब पूरी कायनात से वो बात मनवाता है़,
तू कभी चंचल मृग सा दौड़ता है तो कभी पानी सा बहता है,
तो कभी शांत जल सा कहीं ठहर जाता है,
ओ प्यारे मन तु प्यार की बारीस में हर रोज़ भीगता है.
हेमांगी-
11 JUN 2021 AT 21:09