8 JUN 2020 AT 17:12

न जाने कब.
न जाने कब फिर से वो सुबह आऐंगी,
जब तु अपने बालों को सुखाने छत पर आती थी,
तेरे गीले बाल लगते थे ऐसे,
जेसे कोइ फूल पर ओस पडी हो जेसे,
तु उस नजाकत से बालों को सवरती थी ऐसे,
जेसे भवरे फूलों से रस पीते हो जेसे,
तेरा खिलखिला ना,यूं शरमना,
आंखों के कोने में से मुझे ताकतें रहना,
बातों के लिए होठों का कंपकंपाना,
न जाने कब फिर से महसूस करने को मिलेगा,
तेरी यादों की चद्दर को लिपट कर हर शाम हम सोते है,
उस ऐक उम्मीद में कि कल का सूरज नयी उम्मीद से भरा हुआ होगा.
हेमांगी

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