मुद्दतो बाद जब कलम कागज़ से मिलती है,
यकीन मानों इश़्क की बरसात होती है,
कुछ धूंधली धूंधली तस्वीरे आँखो के परदों के पीछे से आवाज़ लगाती है,
मैं सहमी सहमी सी रेह जाती हूं,
और वक्त ठहर सा जाता है,
हेमांगी-
29 SEP 2021 AT 16:53
मुद्दतो बाद जब कलम कागज़ से मिलती है,
यकीन मानों इश़्क की बरसात होती है,
कुछ धूंधली धूंधली तस्वीरे आँखो के परदों के पीछे से आवाज़ लगाती है,
मैं सहमी सहमी सी रेह जाती हूं,
और वक्त ठहर सा जाता है,
हेमांगी-