11 OCT 2021 AT 21:39

मन की खिड़की में कुछ हलचल है,
कुछ हलचल होठ़ों पर आ कर रुकी है,
एक शाम मेरे आँगन में बैठी हूई है,
और एक शाम मेरे मन के आँगन में,
बहोत देर तक द्वंद चलता है,
मन के भीतर और होठ़ों पर भी ,
पर पता नहीं ये शब्द किस की नज़र से बच नें के लिये आते ही नहीं मेरे होठ़ों के आँगन में,
तिलमिला जाती हूं,
आँसुं भी आँखो के समंदर में ही गोते लगाते है,
पता नहीं किस नज़र नें पाले बांधकर रख्ख दी हो उन निगाहो के दरवज्जे पर,
फिर मैं भी थक जाती हूं मेरे ही द्वंद से,
और बहा देती हूं अपनें आँसुंओ को कागज़ पे,
और फिर एक सुकूंन का फूल खिल जाता है,
मेरे मन कें आँगन में और एक बहार के आँगन में.
हेमांगी

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