12 JUN 2021 AT 17:17

मेनें अकसर तुम्हें लिखनें की कोशिश की है,
मेरे अपनें मुझे अकसर कहां करतें है की पढनां उसी भाषा में होना चाहीये की जिसमें सपनें देखा करते हो ,
पर में उन्हें कैसे समजाउं की तुम तो वो भाषा हो जिसे मै चाहकर भी नहीं लिख सकती!
तुम तो मेरे सपनों की भाषा हो तुमहें मेने अकसर लिखनां चाहा है पर कभी लिख नहीं पाई,
जेसे जेसे वक्त बितता है वैसे वैसे में समजनें लगी हूं की तुमहें में लिख नहीं सकती,
तुम्हें सिर्फ महेसूस कीया जा सकता है,
ख्वाब में,ख्यालो में ,तनहाई में और मेरे मन में.
हेमांगी

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