29 DEC 2021 AT 15:42

कुछ इस तरह ज़िम्मेदारी का बोझ उस
नाजुक से कन्धो पे डाला गया कि
ता उम्र मुस्कुरा बी ना सके
और रो भी ना सके
अपनो की खुशी के लिए
तिल तिल कर जिए
एक रोज पूछा ढली हूई शाम में
अपने हमराज़ आइने को
फूट फूट कर रो पडा
देख उस के अन्दाज को
हेमांगी

-