24 AUG 2021 AT 23:52

कुछ़ ख्वाहिशे मृगतृष्णा सी,
हाथो से फिसलती रेत़ सी,
ना कभी पूरी होती,ना कभी पूरी होने वाली,
कभी कभी थकती,
गीरती ,संभलती,
अपनों के बीच में खूद को ढूंढती,
भीड़ में तन्हां सी,
तन्हांई में लगे कभी कभी अपनी सी,
कुछ़ ख्वाहिशे मृगतृष्णा सी.
हेमांगी

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