कुछ बुझा बुझा सा रहेता है
कुछ उलझा उलझा सा रहता है,
ये ख्याल ही तो है जो मेरे अंदर मचलता रहता है,
वो कैद हो के भी आज़ाद सा है,
ओर मैं आज़ाद होके भी कैद सी,
वो मुझमें कहीं खोया खोया सा है,
तन्हा होके भी तन्हा रहने देता नहीं
वो लिपटता है मेरे मन को, तो कभी
डर सा बन के सिनें मे कैद हो जाता है,
और कभी घुटन सी महसूस करवा जाता है.
कभी पंछी सा बन मेरे मन के आसमां को छुता है,
तो कभी मेरी खामोशी मे बसे अल्फाज़ को टटोलता है.
निचोड देता है मुझे ख्याल उसके ख्याल से,
मे ल़स्त हो जाती हुं ख्वाब के बोझ से,
मौसम की तरह बसता मुझमें वो
धूप सा,शर्द सा, तो कभी कभी बरसाती बूंद सा.
ये ख्याल ही तो है !
पर क्या क्या सपने दिखाते है,
दिमाग मे जोर उसीका ही तो रहता है,
वो बन लहूँ मेरी नस नस में बहता रहता है
मे सोचूं मे आज़ाद सी घूमु फिरूं अपनी मनमर्जी सा,
पर में नादान कैद हूँ खूद के ही ज़िस्म मे ख्याल सा.
हेमांगी-
1 AUG 2021 AT 7:18