खामोशी की लकीर पर पाँव रखकर आज मैंने कुछ अल्फा़जो को चखा है,
वो डायरी की बंध अलमारी में से बाहर ताक जांक कर रहे थे,
शायद कलम की खिड़की से बाहर आना चाहते होंगे,
उन्हें भी बिखरनां शायद अच्छा लगता है,
पर आज कलम की शाही में एक मायुसी बसी है,
जो कुछ अल्फाज़ सूख रहे है,
बहोत सी घुट़न है कागज़ मैं,
जो वो अल्फाज को सूला रहा नही है अपनी आगोस में,
और कुछ मेरे भीतर भी .
हेमांगी-
19 SEP 2021 AT 0:18