कभी कभी ना कुछ खालि सा लगता है,
मन के भीतर शायद कुछ जलता है,
ख्यालो के शहर में कुछ ख्याल डराते है,
बेवज्ह तिलमिलाते है,
ठहरना है,रूकना भी है,
पर पता नहीं कौन सा सवाल रुकनें देता ही नहीं,
फरियादे भी है,
पर मौन की फरियाद की सुनवाई किसी भी कोर्ट में होती ही नहीं,!
ये "क्युं" कभी मेरा दामन छोड़ता ही नहीं!
सवाल पे सवाल,
हर बात पे सवाल,
पर हर बात का एक ही जवाब,
"मौन" भीतर से तोड़ने वाला "मौन".
हेमांगी-
19 NOV 2022 AT 22:16