13 OCT 2021 AT 16:19

कभी कभी लगता है ,
की ये सुब्ह ही ना हो,
रात की लो में हम जलते रहे,
कुछ ख्वाब भी धीमी धीमी सी आँच पर पकते रहे,
हकीकत की चोखट को लांदकर ख्वाबो का माथा चुमकर कुछ खयालों को आज़ाद कर दे,
खूद को अपनें ही जिस्म में कैद कर उस दूनियां की और चले जाये,
जहां रूह को आज़ाद कर मैं उस सफर पर निकल जाउं,
जहां सुकून के धूंट पी कर कुछ वक्त ठहर जाउं.
हेमांगी

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