काग़ज पे शब्द नहीं सोते,
कुछ हसरते, कुछ अरमान भी आ कर लेट जाते है,
कुछ आधे अधूरे अरमानो का एक हिस्सा भी लेट जाता है,
जो अश्क छलक कर बाहर ना सके वो भी कहीं ना कहीं अपनी जग़ह, अपनां वजूद ढूंढते है.
हेमांगी-
23 MAY 2022 AT 18:01
काग़ज पे शब्द नहीं सोते,
कुछ हसरते, कुछ अरमान भी आ कर लेट जाते है,
कुछ आधे अधूरे अरमानो का एक हिस्सा भी लेट जाता है,
जो अश्क छलक कर बाहर ना सके वो भी कहीं ना कहीं अपनी जग़ह, अपनां वजूद ढूंढते है.
हेमांगी-