22 OCT 2021 AT 15:31

जब कभी मैं थक जाती हूं अपनें विचारो से,
अपनीं ही सोच के द्वंद से,
मौंन हो जाती हुं खूद से,
और अपनें शब्दो को बोल नें देती हूं,
पर कभी कभी वो भी मुझ जैसे खामोश हो जाते है,
और एक और स्न्नाटा भीतर जन्म लेता है,
और उस सन्नाटे की इर्द गिर्द मन उछलकूद करता रहेता है,
और फिर आँखो के समंदर से कुछ मोती बह आते है,
मेरे मन के भीतर फिर एक लंब्बी सी खामोशी आकर सो जाती है,
और मैं भी.
हेमांगी

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