एक शाम ऐसी भी आई थी,
जो कुछ वो नाखूश सी थी,
बहोत उदास,
बहोत ही अकेली,
मन कें कौनो से अल्फा़ज को दबोच कर भीतर ही सुला रही थी,
पता था ये वक्त कभी ना कभी आयेगा ही,
भीतर का अंधेरा उसे निगलनें को तैयार था,
वो खूद ही खूद में डूब रही थी,
एक शाम एसी भी आई थी.
हेमांगी-
23 DEC 2022 AT 21:21