बहोत वक्त बित गया,
पलट़कर देखती हुं तो खूद को ही खो देती हूं,
आज भी वो गाना मुझे याद है जो कभी तुम्हारा पसंदीदार हुआ करता था,
रात के अंधेरे में वो गाना और मुझे डूबा देता है,
कभी कभी यूं लगता है ही साँस रूक सी जायेगी,
बहोत दिल तडपता है उन दिनों में लौट़नें को,
अजीब सी बैचेंनी होने लगती है,
जब जब ये गाना सुनती हूं लगता है की पीछे से आकर कोई मुझे छु रहा है,
या फिर यूं महेसूस होता है की कोई मुझ में धीरे धीरे उतर रहा है,
सच में बहोत वक्त हो गया खूद को खूद से गले लगाये,
तुम भी तो मुझ में ही बसे हो!
खूद को गले लगाकर तुम्हारी छुअन को कुछ इस तरह महेसूस कर लेती हूं,
कुछ ख्वाब अधूरे रहेनें के लिये ही तो मन के आँगन में पनपते है,
तुम भी तो वही ख्वाब हो,
अधूरा रहकर भी मुझ में पूरा.
हेमांगी-
2 DEC 2021 AT 21:46