1 MAR 2022 AT 16:52

बहोत बरसो बाद आज अलमारी में से "वो" किताब निकाली,
वैसे तो रोज़ किताबो से इत्फाक रखते है,
पर उस किताब की बात कुछ और है,
बहोत कुछ जूडा है उस एक किताब से,
आज भी वो पन्ना आधा अधूरा ही है,
जैसे हमारी वो बात, मुलाकात अधूरी रही थी कुछ उस तरह,
शायद वो शाम भी अधूरी है,
बहोत कुछ छिपा कर रख्खा है उस किताब के पन्नों के बिच में,
एक गुलाब,वो खूशबूं,वो ठहरा हूआ लम्हां,वो अधूरा रहा वादा,
या शायद वो धोखा,
जब जब वो किताब हाथ में आती है ,
तब सच मानों बिन छूए तुज को छू जाती हूं,
पर अब उस छूअन से हाथो में जलन सी होने लगती है,
शायद! हां शायद दिल में भी.
हेमांगी

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