बहोत बरस बित गये,
उस साये से अलग हुए,
पर आज भी वो मुजसे जुड़ा हुआ है,
कुछ इस तरह जैसे मेरा ही साया हो,
कभी कभी एक सवाल साप की तरह मुजे बार बार डंसता रहता है,
क्या सच में वो इश़्क था!
या फिर था एक भ्रम सा,
अगर इश़्क था तो फिर क्युं उसे याद कभी नहीं आती!
या फिर वो एक हसीन ख्वाब समजकर मुकर गया हकीकत से,
क्या कभी शाम की चाय के वक्त वो खाली पडा कप उसे याद आता होगा!
कभी बारीश की बूंद को हाथ में फिर से वो थामता होगा!
सवालो के चक्रव्यूह में फसी में खूद से ही सवाल करती हूं,
पर हर बार सवाल का जवाब भारी साँस ही दे पाती है,
बिना कीसी मतलब के ,स्वार्थ के,
और फिर एक आँसू सरक कर लबो तक पहोच जाता है,
हर एक सवाल के जवाब में.
हेमांगी-
23 NOV 2021 AT 17:17