बैठो हमारे रूबरू.
बैठो हमारे रूबरू,
करनी है तुमसे कुछ गुफ्तगू,
ये चांद सा हसीं चहरा न देखा है हमनें कभी,
ना देखीं हमनें शराब से भी ज्यादा नशीली ये निगाहें,
मदहोश कर दे तु जब होठों से निकले अलफाज प्यारे,
क्यों हमसे दूरी बनाए बैठी हो!
कि जेसे हम हो कोइ पराएँ,
हम से बातें करों या दिखाओं जूठ मूठ का गुस्सा,
तेरे हर अल्फाज पे मेरा ये दिल है हारा,
ऐसे मत इतराओ ,कतराओ हमसे जेसे कुछ नहीं लगते तुम्हारे,
हमारे दिल में बसी है एक ही मूरत,
ओर तुम्हीं हो वो भगवान हमारे,
बैठो हमसे रूबरू,
करनी है तुमसे कुछ गुफ्तगू.
हेमांगी
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17 JUL 2020 AT 9:20